28 January 2008

मेरा पहला कलाम, आप सभी को सलाम.

दोस्तों, आप सभी को अंकित "सफ़र" का सलाम।
ये मेरी एक कोशिश है जिसके तहत मैं अपनी गजलों, शेरों, कविताओं और नज्मों से आपको रूबरू करवाउंगा। मैं शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ मोहन "मुन्तजिर" का जिनकी शागिर्दी में मैंने काफी कुछ सीखा और उन्होंने मुझे छोटी छोटी बारीकियों से बवास्ता करवाया। मैं शुक्रगुजार हूँ अपने शायर दोस्तों मुस्तफा "माहिर" और अरुण "मासूम" का जिनके साथ मैंने अपनी शायरी को निखारा और उन्होंने कदम कदम पे मेरा साथ दिया।

मगर एक बात जो की कहना बहुत ज़रूरी है वो बात है उस जगह की जहाँ मेरा जन्म हुआ है, जिसकी मिटटी में मैं खेला हूँ,पला हूँ बड़ा हुआ हूँ और सिर्फ़ मेरे लिए ही नहीं ये बात मेरे दोस्तों के लिए भी सच है उस पंतनगर की सरज़मी ने हम लोगों को बहुत कुछ दिया है और हम उसे कभी भूल नहीं सकते।


वैसे कहने को तो बहुत बातें हैं और वो मैं कहूँगा भी और लिखूंगा भी, बस आपको भी थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा क्योंकि अब आपके और मेरी शायरी की बीच जो दूरियां थी वो दूर हो गई हैं।

चंद मिसरे आप सभी के लिए .............................

आप सब जो हैं मिरे, सलाम लिख रहा हूँ।
राज़ दिल के आज मैं तमाम लिख रहा हूँ।

दिल मिरा है इंतज़ार में किसी हसीं के,
मुद्दतों से मुद्दई, वो शाम लिख रहा हूँ।
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