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02 February 2015

ग़ज़ल - मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

इस साल इस ब्लॉग का एकाउंट आख़िरकार फरवरी में जा कर खुल ही गया। गये साल के गुल्लक में एक ही सिक्का खनखना रहा है, गोया ये उसका शोर ही था जो बेचैन किये हुये था। लीजिये जनाब, एक नई नवेली ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है, ज़मीन अता हुई है "सुबीर संवाद सेवा" पर आयोजित तरही मुशायरे से। उसी मुशायरे से पेश है ये ग़ज़ल…



नीम करवट में पड़ी है इक हँसी, सोई हुई
देखती है ख़्वाब शायद ये परी सोई हुई

है बहुत मासूम सी जब तक है गहरी नींद में
परबतों की गोद में ये इक नदी सोई हुई

रात की चादर हटा जब आँख खोली सुबह ने
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

कोई आहट से खंडर की नींद जब है टूटती
यक-ब-यक है जाग उठती इक सदी सोई हुई

अपनी बाहों में लिये है आसमाँ और धूप को
इक सुनहरे ख़्वाब में है ये कली सोई हुई

एक गहरी साँस में निगलेगा पूरी ही ज़मीन
प्यास शायद है समंदर की अभी सोई हुई

ख़्वाब में इक ख़्वाब बुनते जा रही है आदतन
नींद के इस काँच घर में ज़िन्दगी सोई हुई

13 February 2012

ग़ज़ल - इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में

हम अपनी जड़ों से कितना भी दूर चले जाएँ, लेकिन हमारी जड़ें हमसे अलग नहीं होती. वो हरदम हमारे साथ रहती हैं, चाहे वो यादों में रहें या हमारे रहन-सहन या बोल-चाल में रहें. ये नए-नए उगते शहर भी कभी गाँव की शक्ल में रहे होंगे, फिर कस्बे बने होंगे, और अब शहर का रुतबा लेकर इठला रहे हैं. धीरे-धीरे सब बदल रहा है, विकास अपने दायरें बढ़ा रहा है, हर कोई उससे कदम-ताल करके उसके साथ चल रहा है या चलने की कोशिश तो कर ही रहा है.

हम में से कई या कहूं अधिकतर अपने गाँव/कस्बे/शहर से दूर इस विकास से जुड़े हैं या जुड़ रहे हैं, मगर हमारे साथ अपनी एक अलग ही मिठास लिए हमारा एक सुनहरा बीता हुआ कल भी हम से जुड़ा हुआ है .

गाँव (सौनी, रानीखेत, उत्तराखंड) का पुराना मकान वैसे तो अब नया मकान बन गया है 
मगर पुराना अभी भी यादों के सहारे अपनी जगह मजबूती से कायम है.

चलिए इन बातों के गुच्छों से निकल कर कुछ इन्ही हालातों से मिलती-जुलती, इनकी याद दिलाती एक ग़ज़ल कहता हूँ. ये ग़ज़ल गुरुदेव 'पंकज सुबीर जी' के ब्लॉग पे चल रहे तरही मुशायरे में दिए गए एक मिसरे पे कही गई है, इसका आखिरी शेर सीहोर, मध्य प्रदेश के सुकवि रमेश हठीला जी को समर्पित है.

घर की मुखिया बूढी लाठी है अभी तक गाँव में
तज्रिबों की क़द्र बाकी है अभी तक गाँव में

सरपरस्ती में बुजुर्गों की सलाहें हैं छिपी
राय, मुद्दों पर सयानी है अभी तक गाँव में

खेत की उथली सी पगडण्डी को थामे चल रही
बैलगाड़ी की सवारी है अभी तक गाँव में

दिन ढले चौपाल पर यारों की नुक्कड़, बैठ कर
रात के परदे गिराती है अभी तक गाँव में

क्या मुहब्बत भी किसी फरमान की मोहताज है?
फैसले ये 'खाप' देती है अभी तक गाँव में

शहर में कब तक जियेगा यूँ दिहाड़ी ज़िन्दगी
लौट जा घर, दाल-रोटी है अभी तक गाँव में

फूल की खुश्बू ने लांघे दायरे हैं गाँव के
पर बगीचे का वो माली है अभी तक गाँव में

मेरे बचपन की कई यादों के दस्तावेज़ सा
इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में

आ चलें फिर गाँव को, रिश्तों का लेने ज़ायका
एक चूल्हा, एक थाली है अभी तक गाँव में

सुकवि रमेश हठीला जी को समर्पित शेर,
ज़िन्दगी की शाख पे फिर फूल बन कर लौट आ
तेरे जाने की उदासी है अभी तक गाँव में

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24 March 2008

ग़ज़ल - अब तलक मेरा रहा अब आपका हो जाएगा

बहरे रमल मुसमन महजूफ
२१२२-२१२२-२१२२-२१२

अब तलक मेरा रहा अब आपका हो जाएगा।
इस दिवाने यार दिल का कुछ पता हो जाएगा।

तू अगर चाहे तो तुझको मैं भुला दूँगा मगर,
है जो वादा धड़कनों से वो दगा हो जाएगा।

आज की ये ज़िन्दगी अब ताजगी खोने लगी,
याद कर बातें पुरानी सब नया हो जाएगा।

दिल जिगर में, धड़कनों में, रूह में तू बस गई,
बिन तिरे जीना बड़ा मुश्किल मिरा हो जाएगा।

इश्क में यारों ने हिम्मत तो बड़ा दी है "सफर",
सामने जब वो रहंगे सब हवा हो जाएगा।