इस साल इस ब्लॉग का एकाउंट आख़िरकार फरवरी में जा कर खुल ही गया। गये साल के गुल्लक में एक ही सिक्का खनखना रहा है, गोया ये उसका शोर ही था जो बेचैन किये हुये था। लीजिये जनाब, एक नई नवेली ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है, ज़मीन अता हुई है "सुबीर संवाद सेवा" पर आयोजित तरही मुशायरे से। उसी मुशायरे से पेश है ये ग़ज़ल…

नीम करवट में पड़ी है इक हँसी, सोई हुई
देखती है ख़्वाब शायद ये परी सोई हुई
है बहुत मासूम सी जब तक है गहरी नींद में
परबतों की गोद में ये इक नदी सोई हुई
रात की चादर हटा जब आँख खोली सुबह ने
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई
कोई आहट से खंडर की नींद जब है टूटती
यक-ब-यक है जाग उठती इक सदी सोई हुई
अपनी बाहों में लिये है आसमाँ और धूप को
इक सुनहरे ख़्वाब में है ये कली सोई हुई
एक गहरी साँस में निगलेगा पूरी ही ज़मीन
प्यास शायद है समंदर की अभी सोई हुई
ख़्वाब में इक ख़्वाब बुनते जा रही है आदतन
नींद के इस काँच घर में ज़िन्दगी सोई हुई