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04 December 2009

ग़ज़ल - उठो कि कुछ नया करें

आजकल भोपाल में डेरा जमाये हुए हूँ। पिछली पोस्ट में किये गए वादे के मुताबिक एक नयी ग़ज़ल के साथ हाज़िर हूँ, जो गुरुदेव  के आशीर्वाद से कृत है.

उठो कि कुछ नया करें।
ज़मीं को फिर हरा करें।

हमारा हक़ गया, कहाँ
चलो ज़रा पता करें।

जो प्‍यार से मिले उसे
मुहब्बतें अता करें।

न सूर्य बन सकें अगर
चराग बन जला करें।
.
बुजुर्ग जो हैं कह रहे
जवां उसे सुना करें।

ख़ुशी के दाम हैं बहुत
ग़मों से जी भरा करें।

न लुप्त हो हँसी कहीं
मिला करें, हँसा करें।

तमाशबाज़ सोच में
अब इसके बाद क्या करें।

ये ज़िन्दगी है चाय गर
तो चुस्कियां लिया करें। 

अभी हाल-फिलहाल में दोस्तों के साथ जबलपुर की सैर करके आया हूँ, उसी यात्रा से जुड़े हुई कुछ यादें फोटो की शक्ल में आपसे मुखातिब हैं।

धुआंधार, माँ नर्मदा का पावन जल
 
पंचवटी भेराघाट, संगमरमर के लिए मशहूर (रात में कई रंगों में नज़र आता है संगमरमर)

@ भेराघाट