आज जिस ग़ज़ल से आप का तआरुफ़ करवाने जा रहा हूँ, मुमकिन है आप उस ग़ज़ल से 'सुबीर संवाद सेवा' में आयोजित तरही मुशायरे में भी मिल चुके होंगे। ये भी सच है कि पहली मुलाक़ात ही दूसरी बार मिलने का सबब बनती है।
गो मुलाकातें अपनी बढ़ी हैं प्रिये फिर भी कुछ आदतें अजनबी हैं प्रिये उजला-उजला सा है तेरा चेहरा दिखा
ऐसा लग रहा है कि एक मुद्दत हो गयी, कुछ कहें, कुछ लिखे इस ब्लॉग पर.......... कुछ धुंधला सा नज़र आता है कि इस ब्लॉग पे पिछली पोस्ट तकरीबन २ महीने पहले लगी थी, और तब से कुछ नहीं. वजह फिर वही पुरानी, घिसी-पिटी, उसी वक़्त की सख्ती, उसी वक़्त को बारहा कोसना।
इसी दरम्यान ऑफिस के काम के सिलसिले में 'श्री लंका' भी जाना हुआ, घूमना फिरना तो ज्यादा हुआ नहीं इसलिए यात्रा वृतांत क्या लिखूँ ......... जितना भी श्री लंका को देखा, समझा और जाना, उससे बहुत खूबसूरत देश लगा, वहां के लोग बहुत अच्छे लगे.
एक छोटा देश, जिसकी आबादी मात्र २ करोड़ है, ये मात्र इसलिए क्योंकि तकरीबन इतनी आबादी तो मुंबई में ही होगी। बाहर घूमने के लिए जब कोलम्बो में मॉल, सड़कों और गलियों की सैर की तो शुरू में लगा कि आज शायद शहर बंद होगा, मगर फिर पता लगा ये तो आम है, किसी आम दिन की तरह ...... अब मुंबई की भीड़ देखने के बाद अगर कहीं किसी और जगह जब कुछ कम लोग दिखते हैं तो आँखों को कुछ खटकता सा लगता है.
आप सब के लिए उन गुज़री यादों को सहेजे हुए एक फोटो छोड़ जा रहा हूँ जो मोबाइल फ़ोन से गाले नामक जगह में एक पर्वत से खींची गयी है। ये वो पर्वत है जिसे लोकात्तियों एवं पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी द्वारा हिमालय से लाया गया था, जिसे संजीवनी पर्वत के नाम से विख्याति मिली। कहते है कि आज भी यहाँ इस पर्वत पे संजीवनी और उसके अलावा भी कई अमूल्य और अचूक जड़ी-बूटियाँ उपलब्ध हैं।
इन बातों से आगे बढ़ते हुए एक ग़ज़ल आप सब के लिए वैसे तो ये ग़ज़ल थोड़ी पुरानी है, सीहोर में हुई नशिस्त में सुनाई थी तब से वीनस पीछे पढ़ा हुआ था कि ब्लॉग पे फिर से लगा दो।
बहरे मुतदारिक मुसमन सालिम (२१२-२१२-२१२-२१२)
रात भर ख़त तेरा यूँ खुला रह गया।
जैसे कमरे में जलता दिया रह गया।
भूख दौलत की बढती रही दिन-ब-दिन,
आदमी पीछे ही भागता रह गया।
छीन के ले गई मुझ से दुनिया ये सब,
बस तेरी याद का आसरा रह गया।
ख़्वाब की ज़िन्दगी क्या है किसको पता?
एक पूरा हुआ, दूसरा रह गया।
पास आ तो गए पर न वो बात है,
कुरबतें तो बढ़ी, फासला रह गया।
क्या बताऊँ "सफ़र", उसके बारे में अब,
मैंने सोचा उसे, सोचता रह गया।
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तो ये थी जनाब मेरी ग़ज़ल और जाते जाते आप सब के लिए छोड़ जा रहा हूँ जगजीत सिंह साहब की रेशमी आवाज़ में इस "फूल खिला दे .............." ग़ज़ल को। जिसे उन्होंने काफी वक़्त बाद किसी फिल्म में गाया है, शकील आज़मी साहब की लिखी हुई ये ग़ज़ल रूप कुमार राठोड के संगीत में लयबद्ध है. फिल्म का नाम है "लाइफ एक्सप्रेस". तब तक आप भी अपने आप को भिगोइए इस ग़ज़ल में।
आप इस ग़ज़ल को यहाँ से डाउनलोड भी कर सकते हैं - http://www.divshare.com/download/12639002-7e3
वैसे तो ये ग़ज़ल, आप से गुरु जी के ब्लॉग पे तरही मुशायेरे में रूबरू हो चुकी है. कुछ पुरानी भी हो गयी है मगर कहते है ना पुरानी चीज़ या कहें की ग़ज़ल और निखरती है तो इसी आस में इस ग़ज़ल को यहाँ ले आया.
वैसे जब गुरु जी से मुलाकात हुई तो कुछ गलतियों से या कहूं बहुत सी गलतियों से साक्षात्कार होना लाजिमी था. उन्ही में से एक गलती इस ग़ज़ल में छुपी हुई थी इस ग़ज़ल के एक शेर का मिसरा पहले यूँ था "इक शरारत दुकां ने करी उससे यूँ", इसमें एक लफ्ज़ "करी" आया था जो सही कहें तो सही नहीं है वो तो हम अपनी आम बोलचाल की भाषा में इसे शामिल कर चुके है और जबरदस्ती इसका वजूद बना रहे हैं,तो उसी को सुधार कर ग़ज़ल आपके सामने पेश कर रहा हूँ.
अर्ज़ किया है.............
साथ बीते वो लम्हें सताते रहे.
दूर जब तुम गए याद आते रहे.
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एक नकली हंसी ओढ़ के उम्र भर,
दर्द जो दिल में था वो छिपाते रहे.
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आसमां छूने का ख़्वाब दिल में सजा,
हम पतेंगे ज़मीं से उड़ाते रहे.
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दांव पेंचों से वाकिफ़ नहीं चुगने के,
वो परिंदे नए चहचहाते रहे.
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इक शरारत दुकां कर गयी उससे यूँ,
कुछ खिलौने उसे ही बुलाते रहे.
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खौफ हासिल हुआ हादसों से मुझे,
ख़्वाब कुछ ख़्वाब में आ डराते रहे.
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आंधियां हौसलों को डिगा ना सकीं,
दीप जलते रहे झिलमिलाते रहे.
एक बात आप सभी को और बताते हुए चलता हूँ इस तरही मुशायेरे में अज्ञात शख्स (गुरु जी) के नाम से एक ग़ज़ल लगी थी जो गौतम भैय्या की पारखी नज़र से बच ना सकी, गुरु जी ने उस ग़ज़ल पे मात्र जी हाँ मात्र ४०-५० शेर लिखे थे जिसमे से सिर्फ कुछ ही हम सबको पढने को मिले थे.
इस पोस्ट में अभी इतना ही, अगली पेशकश में एक नयी ग़ज़ल के साथ मिलूँगा आपसे, ये वादा रहा.
चलते-चलते परी और पंखुरी का एक चित्र छोड़ जा रहा हूँ..................
दो दिन से बुखार के कारण बिस्तर पर पड़ा हुआ था, और उसी का परिणाम है कुछ ग़ज़लें। उनमे से जो ग़ज़ल सबसे पहली बनी थी उसे यहाँ पे पेश कर रहा हूँ, गुरु जी( पंकज सुबीर जी) की भी बात दिमाग में थी.....
"प्रिय अंकित तुम्हारी ग़ज़लें देख रहा हूं और ये पा रहा हूं कि तुम कठिन काफिया और रदीफ के चक्कर में उलझे हो और उसी के कारण भर्ती के काफिये और रदीफ लेने पड़ रहे हैं । मैनं पिछली कक्षाओं में बताया है कि ज़रूरी नहीं है कि कठिन काफिया और रदीफ ही लिया जाये । सरल काफियों पर भी बेहतरीन ग़ज़लें लिखी गईं हैं । ग़ालिब की मशहूर ग़ज़लें बहुत सरल काफियों पर हैं । तुम्हारी पिछली दोनों ग़ज़लें कठिन काफियों और कठिन रदीफों का शिकार हैं । इससे बाहर निकलो और आम बोलचाल की भाषा में लिखो जैसे ग़ालिब कहते हैं कि हरेक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है तुम्हीं कहो के ये अंदाज़े ग़ुफ्तगू क्या है । सरल लिखो पर गहरा लिखो । कठिन लिखोगे तो उथला हो जायेगा ।"