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01 December 2016

ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है


आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है

मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है

तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है

इस लम्हे का हुस्न यही है
के ये इसके बाद नहीं है

उसने आह भरी तो जाना
दर्द मेरा बेदाद नहीं है

नींद खुली तो ढह जायेंगे
ख़्वाबों की बुनियाद नहीं है

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फोटो - साभार Korekgraphy

22 April 2010

ग़ज़ल - मेरी साँसों में बहती है...तेरी साँसों की सरगम भी

एक ताज़ा ग़ज़ल आपके लिए पेश-ए-ख़िदमत है।

बहर :- बहरे मुतदारिक मुसमन मक्तूअ
रुक्न:- २२-२२-२२-२२

बेचैनी का ये आलम भी.
पागल तुम दीवाने हम भी.

प्यार भरे तेरे इस ख़त में
लफ्ज़ चले आये कुछ नम भी.

मेरी साँसों में बहती है
तेरी साँसों की सरगम भी.

इक संदूक मिला खुशियों का
एक पोटली में कुछ ग़म भी.

साथ चले आये बारिश के
बीती यादों के मौसम भी.

तुमने आने की जिद क्या की
वक़्त चले अब कुछ मद्धम भी.

अभी आप से विदा लेता हूँ इस वादे के साथ कि एक ताज़ा ग़ज़ल के साथ जल्द ही वापिस आऊंगा...............

22 August 2009

ग़ज़ल - जब ख़ुद से मिलता हूँ अक्सर

राजस्थान में एक महीने की ट्रेनिंग के बाद कुछ ही वक़्त बिताया मुंबई में और फिर आ गया उत्तर प्रदेश में, वैसे आजकल लखनऊ में डेरा जमाया हुआ है और यहीं पर बना रहेगा ९ सितम्बर तक. वीनस जी ने पूछा था की इलाहाबाद कब आना हो रहा है? वीनस जी इस बार तो मौका नहीं मिल पायेगा अगली बार पूरी कोशिश रहेगी.

हाज़िर हूँ आप सबके सामने एक छोटी बहर (बहरे मुतदारिक मुसमन मक्तूअ २२-२२-२२-२२) की ग़ज़ल के साथ, जो गुरु जी का आर्शीवाद पाकर, आपका प्यार लेने के लिए आ गई है.

जब ख़ुद से मिलता हूँ अक्सर
सोच हजारों लेंती टक्कर

जंग छिडी लगती दोनों में
बारिश की बूंदे औ' छप्पर

खेल गली के भूल गए सब
जब से घर आया कंप्यूटर

नफरत, आदम साथी लगते
याद किसे अब ढाई आखर

कद ऊँचा है जिन लोगों का
आंसू अन्दर, हंसते बाहर

ज़ख्म कहाँ भर पाए गहरे
आँखों में सिमटे हैं मंज़र

हर अच्छा है तब तक अच्छा
जब तक मिल पाए ना बेहतर

पिछली बार नीरज जी ने कहा था की जयपुर की कोई फोटो नहीं लगाई, वैसे लगाई तो थी मगर लीजिये एक और सही. ये अलबर्ट म्यूज़ियम के बाहर का नज़ारा है. अभी तक के लिए इतना ही, जल्द ही हाज़िर होता हूँ।

26 December 2008

ग़ज़ल - उसकी रीडिंग लिस्ट में भी / अव्वल 'एरिक सीगल' है

आजकल ज़्यादा वक़्त निकलना मुमकिन नहीं हो पा रहा है, एम.बी.ए के आखिरी दौर में हूँ (मतलब प्लेसमेंट्स)। एक कोशिश की है, कुछ ख़याल ख्याल आ गए थे और फ़िर कलम चल पड़ी ख़याल बुनने के सफ़र पर  .......................

दरअसल मेरी कोई ग़ज़ल शायद ही कभी मुकम्मल तौर पे लिखी गई होगी, हर एक ग़ज़ल में नये शेर वक़्त के साथ-साथ कड़ी दर कड़ी जुड़ते चलते रहते हैं।


ज़िद में रखता बादल है
बचपन कितना पागल है

कसमों वादों को सुनता,
कॉलेज में इक पीपल है

जो उतरेगा डूबेगा
ख़्वाहिश ऐसी दलदल है

उसकी रीडिंग लिस्ट में भी
अव्वल 'एरिक सीगल' है

मैं रोया तो चुप करने
आया माँ का आँचल है

दिन है छोटा सा किस्सा
शब इक मोटा नॉवल है

झाँक रही है धूप यहाँ
कमरा क्या है! जंगल है

08 December 2008

ग़ज़ल - चाँद खिलौना तकते थे

चाँद खिलौना तकते थे।
जब यारों हम बच्चे थे।

रिश्तों में इक बंदिश है,
हम आवारा अच्छे थे।

डांठ नही माँ की भूले,
जब बारिश में भीगे थे।

कुछ नए शेर जोड़ रहा हूँ....................................

पास अभी भी हैं मेरे,
तुने ख़त जो लिक्खे थे।

ठोकर खा के जाना है,
बात बड़े सच कहते थे।

यार झलक को हम तेरी,
गलियों-गलियों फिरते थे।

उसने ही ठुकराया है,
हम उम्मीद में जिनसे थे।

24 November 2008

ग़ज़ल - रात लपेट के सोया हूँ मैं

आँखे जब भी बोलें जादू
बातें शोख, अदा इक खुशबू

तेरी आँखों का ये जादू 
काबू में है दिल बेकाबू 

रात लपेट के सोया हूँ मैं 
चाँद को रख कर अपने बाज़ू 

एक ख़याल तुम्हारा पागल 
लफ़्ज़ों से खेले हू-तू-तू 

जब लम्हों की जेब टटोली 
तुम ही निकले बन कर आँसू 

याद तुम्हारी फूल हो जैसे 
सारा आलम ख़ुश्बू-ख़ुश्बू

बीच हमारे अब भी वो ही 
तू-तू-मैं-मैं, मैं-मैं-तू-तू 

दुनिया को क्यूँ कोसे ज़ालिम 
जैसी दुनिया वैसा है तू

नींद के पार उभर आया है 
ख़्वाब सरीखा कोई टापू 


[हिंदी चेतना जनवरी-मार्च 2013 अंक में प्रकाशित]


20 November 2008

ग़ज़ल - सबका अपना अपना कहना

सबका अपना, अपना कहना।
कहते रहना, कहते रहना।
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ये कश्ती ही जाने है बस,
किस जानिब है उसको बहना।
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बात पता ये मुझको ना थी,
बिन तेरे है मुश्किल रहना।
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दिल में जो हैं दर्द पुराने,
वो चाहे बस दिल में रहना।
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सोच यही माँ बेचे जेवर,
मेरे बच्चे मेरा गहना।
.
झूठ बड़ा होने से पहले,
लाजिम है फ़िर सच को कहना।
.
बाबा ने एक बात सिखाई,
बेटा आगे बढ़ते रहना।