Showing posts with label ग़ज़लगोई. Show all posts
Showing posts with label ग़ज़लगोई. Show all posts

31 August 2019

ग़ज़ल - मैं मुहरा बन के जिसका फिर रहा था




मैं मुहरा बन के जिसका फिर रहा था।
वो अपनी चाल में शातिर रहा था।

दिया हर शाख़ ने उसको सहारा,
वो पत्ता टूट कर जब गिर रहा था।

अचानक से नहीं ख़ामोशी छाई,
ये मौसम धीरे-धीरे घिर रहा था।

तेरी ऊँगली पकड़ कर ख़्वाब मेरा,
इसी दुनिया में ख़ुश-ख़ुश फिर रहा था।

रखा परदे में अपना इश्क़ तू ने,
मैं अपने इश्क़ में ज़ाहिर रहा था।

परखना काम है हर वक़्त का, और
वो अपने काम में माहिर रहा था।

---------------------

फोटो - 'Pillars Of Deceit' Painting by Michael Lang

01 December 2016

ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है


आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है

मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है

तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है

इस लम्हे का हुस्न यही है
के ये इसके बाद नहीं है

उसने आह भरी तो जाना
दर्द मेरा बेदाद नहीं है

नींद खुली तो ढह जायेंगे
ख़्वाबों की बुनियाद नहीं है

*********
फोटो - साभार Korekgraphy

11 May 2016

ग़ज़ल - रंग सब घुलने हैं आख़िर इक कलर में


ख़ौफ़ शामों का सताता है सहर में
कुछ अँधेरे घर बना बैठे हैं घर में

उम्र पर चढ़ती सफ़ेदी कह रही है
रंग सब घुलने हैं आख़िर इक कलर में

धूप कुछ ज़्यादा छिड़क बैठा है सूरज
छाँव सब कुम्हला गई हैं दोपहर में

ज़िन्दगी यादों की दुल्हन बन गई है
बूँद अमृत की मिला दी है ज़हर में

बारिशों का ज़ोर था माना मियाँ पर
बल नदी जैसे दिखे हैं इस नहर में

दर्द को आवाज़ देती कुछ सदायें
गूँजती हैं रोज़ गिरजे के गजर में

ख़ूबियों को इक तरफ़ रख कर के सोचो
ऐब भी आयें अगर कोई हुनर में

-----------------------
फोटो - साभार इंटरनेट 

27 April 2016

ग़ज़ल - उसकी आँखों ने फिर ठगा है मुझे


उसकी आँखों ने फिर ठगा है मुझे
हिज्र इस बार भी मिला है मुझे

नींद बैठी है कब से पलकों पर
और इक ख़्वाब देखता है मुझे

जिस्म नीला पड़ा है शब से मेरा
साँप यादों का डस गया है मुझे

ज़िन्दगी की तवील राहों पर
उम्र ने रास्ता किया है मुझे

एक उम्मीद के बसेरे में
शाम होते ही लौटना है मुझे

रात भर नींद हिचकियाँ ले है
ख़्वाब ये किसका सोचता है मुझे

प्यारे दीवानगी बचाये रख
दश्त ने देख कर कहा है मुझे

तेरी चारागरी को हो मालूम
बस तेरा लम्स ही दवा है मुझे

ख़्वाब इक झिलमिलाया आँखों में
क्या तेरी नींद ने चखा है मुझे

इक सदा हूँ तेरी तरफ बढ़ती
अपने अंजाम का पता है मुझे

---------------------
फोटो - साभार इंटरनेट

25 January 2016

ग़ज़ल - लौटती हर सदा बताती है


लौटती हर सदा बताती है
आसमां तक पुकार जाती है

एक तस्वीर पर्स में मेरे
देखता हूँ तो मुस्कुराती है

क्यूँ ये दिल मुँह फुलाये बैठा है?
एक धड़कन इसे बुलाती है

प्यार की एक दुखती रग दिल को
हाँ, बहुत ज़ोर से दुखाती है

मुझ पे ठहरी निगाह इक तेरी
कोई मंतर सा बुदबुदाती है

हम हक़ीक़त से मिल नहीं पाते
उम्र ख़्वाबों में बीत जाती है

साथ अपनों के जब भी होता हूँ
ज़िन्दगी क्यूँ मुझे डराती है

--------------------------------------

Pebble Art by Sharon Nowlan

30 November 2015

ग़ज़ल - हर इक साँचे में ढल जाये ज़रा ऐसे पिघल प्यारे


हर इक साँचे में ढल जाये ज़रा ऐसे पिघल प्यारे
तू अपनी सोच के पिंजरे से बाहर तो निकल प्यारे 

झुकायेगा नहीं अब पेड़ अपनी शाख पहले सा 
तेरी चाहत अगर ज़िद्दी है तो तू ही उछल प्यारे 

पस-ए-हालात में ख़ामोशियाँ भी चीख उट्ठी हैं 
रगों में गर लहू बहता है तेरे तो उबल प्यारे 

जहाँ फ़रियाद गुम होने लगे आवाज़ में अपनी 
वहाँ पर टूटने ही चाहिये सारे महल प्यारे 

निवाला आज भी मुश्किल से मिलता है यहाँ लेकिन 
फले-फूले हैं हाथी, साइकिल, पंजा, कमल प्यारे 

है अहल-ए-शहर का लहजा न जाने तल्ख़ क्यूँ इतना 
सुनाना चाहता हूँ मैं यहाँ बस इक ग़ज़ल प्यारे 

13 September 2015

ग़ज़ल - ख़ुश्क निगाहें, बंजर दिल, रेतीले ख़्वाब


वक़्त तेरे जब आने का हो जाता है
दीवाना… और दीवाना हो जाता है

आँखें ही फिर समझौता करवाती हैं
नींद से जब मेरा झगड़ा हो जाता है

ख़ुश्क निगाहें, बंजर दिल, रेतीले ख़्वाब
देख मुहब्बत में क्या-क्या हो जाता है

एक ख़याल ख़यालों में पलते-पलते
रफ़्ता-रफ़्ता अफ़साना हो जाता है

चंद बगूले यादों के उड़ते हैं और
धीरे-धीरे सब सहरा हो जाता है

26 May 2015

ग़ज़ल - युग बदलती सोच की सौगात के

जब हम बार-बार ये सोचते हैं कि किसी ख़ास शख़्स या शै के बारे में बिलकुल भी न सोचें, तो हम ख़ुद को उन्हीं गलियों की तरफ मोड़ते हैं जहाँ हम जाना नहीं चाहते, मगर चाहते हैं कि जायें। अपने को बेहतर तरीके से जानने के लिए, ये 'न चाहना' का 'चाहना' ज़रूरी भटकाव है, शायद !


युग बदलती सोच की सौगात के 
रंग बदले-बदले हैं देहात के 

ख़्वाहिशें मेरी मुसलसल यूँ बढ़ीं 
हो गईं बाहर मेरी औक़ात के 

अलविदा जब दिन ने सूरज को कहा 
शाम ने परदे गिराये रात के 

ख़ामुशी कसने लगी है तंज अब 
रास्ते कुछ तो निकालो बात के 

कुछ दिनों तक मन बहकने दो ज़रा 
ख़्वाहिशों पर रंग हैं जज़्बात के 

खेलने के बस तरीके बदले हैं 
खेल तो वैसे ही हैं शह-मात के 

गोधरा पर ट्रेन जब ठहरी ज़रा 
घाव फिर ताज़ा हुये गुजरात के 

मुश्किलें बेहतर बतायेंगी 'सफ़र'
लोग कितना साथ देंगे साथ के 

--------------------------------

Painting (Checkmate) by Andrea Banjac 

21 April 2015

ग़ज़ल - ज़रा आवाज़ दे उसको बुला तो

न जाने कितनी आवाज़ें हमारे साथ हमारे कदमों से लिपट कर ताउम्र बेसाख़्ता चलती रहती हैं। उनमें से कई तो गुज़रते वक़्त के साथ दम तोड़ देती हैं तो कुछ ताउम्र पाँव में घुँघरू बन कर छन-छन बजती रहती हैं। इन्हीं आवाज़ों में कहीं, हमसे बहुत पीछे छूटा हमारा मुहल्ला है, तो कहीं बेलौस यारियाँ हैं और उन्हीं में ही कहीं एक अनकहे प्यार का टुकड़ा भी है …


ज़रा आवाज़ दे उसको बुला तो
न लौटे, फिर वो शायद, अब गया तो

तेरी आँखों का साहिल है कहाँ तक !
मैं उस से पूछता ये.… पूछता तो

भरा है खुश्बुओं से तेरा कमरा
पुराने ख़त सलीक़े छुपा तो

मैं ख़ुद को लाख भटकाऊँ भी तो क्या !
तुम्हीं तक जायेगा हर रास्ता तो

मेरी ख़ामोशियाँ पहचान जाता
मुझे अच्छे से गर वो जानता तो

है जिनकी सरपरस्ती हम पे काबिज़
बुतों में ढल गये वो देवता तो

बिना सोचे ही तुम ठुकरा भी दोगे
तुम्हारा मशविरा तुम को मिला तो

भरोसे की ही बस सूरत बची फिर
दिया अपना जो उसने वास्ता तो

=======================
{Painting by Andrea Banjac}

25 March 2015

ग़ज़ल - ये इक सिगरेट नहीं बुझती कभी से

न जाने कितने ही लम्हें ऐसे होते हैं जो राख हो कर भी अपनी आँच सम्हाले रखते हैं ताकि कारवान-ए-ज़िन्दगी को सर्द वक़्त में गर्माहट दे सकें, और ज़िन्दगी खुशरंग बनी रहे। 


कहूँ क्या शोख़ कमसिन सी नदी से
तेरे अंदाज़ मिलते हैं किसी से

हमारे होंठ कुछ हैरान से हैं
तुम्हारे होंठ की इस पेशगी से

तुम्हें मिल जायेगा क्या ऐ निगाहों
हमारे दिल की पल-पल मुखबिरी से

हुई हैं राख कितनीं रात फिर भी
ये इक सिगरेट नहीं बुझती कभी से

झरोका बात का जल्दी से खोलो
ये रिश्ता मर न जाये ख़ामुशी से

नये रिश्ते की क्या कुछ शक़्ल होगी
अगर आगे बढ़े हम दोस्ती से

02 March 2015

ग़ज़ल - ऐ काश कि पढ़ सकता तू बादल की शिकन भी

ये अचानक से मौसम के करवट बदलने का ही असर जानिये कि फरवरी ने तल्ख़ और गर्म हवाओं की केंचुली उतार फेंकी है। उदासियाँ बूँद-बूँद कर बह रही हैं, स्याह बादल जी को ज़्यादा भा रहे हैं और ख़यालों से सौंधी सी ख़ुश्बू उड़ रही है .... 


ऐ काश कि पढ़ सकता तू बादल की शिकन भी 
बूँदों में था लिपटा हुआ बारिश का बदन भी 

उसने यूँ नज़र भर के है देखा मेरी जानिब 
आँखों में चली आई है हाथों की छुहन भी 

ऐ सोच मेरी सोच से आगे तू निकल जा 
उन सा ही सँवर जाये ये अंदाज़-ए-कहन भी 

बातों में कभी आई थी मेहमान के जैसे 
अफ़सोस के घर कर गई दिल में ये जलन भी 

आहिस्ता से पलकों ने मेरी जाने कहा क्या
अब नींद में ही टूटना चाहे है थकन भी

ढ़लती ही नहीं है ये मुई रात में जा कर 
चुपचाप किसी शाम सी अटकी है घुटन भी 

आग़ाज़-ए-मुहब्बत है 'सफ़र' मान के चलिये 
इस राह में आयेंगे बयाबाँ भी चमन भी 

11 February 2015

ग़ज़ल - कभी जो दूधिया सी शब गुरूर में नहाये है

कुल जमा 28 दिनों की फरवरी नये साल के कैनवास पर रंगे वादों को गहराती है। दरअसल जनवरी महीना तो नये की ख़ुमारी और पिछले साल की यादों के हैंगओवर में ही निकल जाता है। प्रेम में पगी फरवरी ज़िन्दगी और इश्क़ के बीच राब्ता बनाये रखने की बुनियाद है।


कभी जो दूधिया सी शब गुरूर में नहाये है
वो… चाँद को उधेड़कर अमावसें बनाये है

जो लम्स तेरे हाथ का नसीब हो गया इसे
ये चोट फिर तो जिस्म से किसी तरह न जाये है

फ़लक़ के जिस्म पर गढ़ा था एक चाँद तुम ने जो
वो सुबह की तलाश में हर एक शब जलाये है

लिबास-ए-मुफ़लिसी भी गो विरासतों से कम नहीं
बड़ों के जिस्म पर भी था हमें भी अब सजाये है

वो बचपना जो घुल गया है साथ बढ़ती उम्र के
कभी-कभी वो बेसबब सी हरक़तों में आये है

ये जिस्म जिस से है बना उसी में जा के मिलना है
फ़िज़ूल रोना पीटना, फ़िज़ूल हाय-हाय है

-----------
शब : रात
लम्स : स्पर्श
फ़लक़ : आसमान
लिबास-ए-मुफ़लिसी : गरीबी का वस्त्र 

02 February 2015

ग़ज़ल - मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

इस साल इस ब्लॉग का एकाउंट आख़िरकार फरवरी में जा कर खुल ही गया। गये साल के गुल्लक में एक ही सिक्का खनखना रहा है, गोया ये उसका शोर ही था जो बेचैन किये हुये था। लीजिये जनाब, एक नई नवेली ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है, ज़मीन अता हुई है "सुबीर संवाद सेवा" पर आयोजित तरही मुशायरे से। उसी मुशायरे से पेश है ये ग़ज़ल…



नीम करवट में पड़ी है इक हँसी, सोई हुई
देखती है ख़्वाब शायद ये परी सोई हुई

है बहुत मासूम सी जब तक है गहरी नींद में
परबतों की गोद में ये इक नदी सोई हुई

रात की चादर हटा जब आँख खोली सुबह ने
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

कोई आहट से खंडर की नींद जब है टूटती
यक-ब-यक है जाग उठती इक सदी सोई हुई

अपनी बाहों में लिये है आसमाँ और धूप को
इक सुनहरे ख़्वाब में है ये कली सोई हुई

एक गहरी साँस में निगलेगा पूरी ही ज़मीन
प्यास शायद है समंदर की अभी सोई हुई

ख़्वाब में इक ख़्वाब बुनते जा रही है आदतन
नींद के इस काँच घर में ज़िन्दगी सोई हुई

10 September 2014

ग़ज़ल - किसी कमीज़ के कॉलर बटन से होते हैं

… कुछ शेर ऐसे होते हैं जिनके हो जाने के बाद, दिल और मन का हर एक कमरा रौशन हो उठता है। खुली खिड़कियों से जब वो सपनीले शेर छन से ग़ज़ल की ज़मीन पर उतरते हैं तो ग़ज़ल एक नये आसमान को देखती है।



किसी कमीज़ के कॉलर बटन से होते हैं
दिलों के मसअले नाज़ुक बदन से होते हैं

निगाह पड़ते ही यादों के दश्त में गायब
पुराने ख़त के फ़साने हिरन से होते हैं

हमारे जिस्म में नीदें उड़ेल देती है
हमें तो रोज़ ही शिकवे थकन से होते हैं

मुहब्बतों के सिरे ढूँढने पे पाओगे
तमाम रिश्ते फ़क़त अपनेपन से होते हैं

बदलती रहती हैं पल-पल में ख़्वाहिशें दिल की
दिलों के फैसले बच्चों के मन से होते हैं

हरेक रिश्ता बनाना हमारी हद में नहीं
कुछ एक रिश्ते तो पैदा जलन से होते हैं

16 December 2013

ग़ज़ल - हमारे सब्र का वो खूबसूरत पल निकल आये

वीनस मुंबई आया हुआ था और मेरे घर पर बैठकर मेरी डायरी के सफ़े पलटते-पलटते ग़ज़लों की छान-पटक भी कर रहा था। और डायरी की तक़रीबन सभी ग़ज़लों से गुज़र कर उसने मुझसे कहा अंकित भाई, आप 'याद' लफ़्ज़ को अपनी हर ग़ज़ल में कहीं न कहीं ले ही लाते हैं अब अगली ग़ज़ल में ज़रा बचने की कोशिश कीजियेगा। मैंने हामी भर दी।

बातों का सिलसिला देर रात तक चलता रहा और अचानक ही वीनस ने मेरे हवाले उसका एक मिसरा ''उसी रस्ते पे तेरी याद के जंगल निकल आये'' कर दिया, ये कहते हुये कि उसने इसको बाँधने की बहुत कोशिश की मगर अभी तक नाकाम रहा है। मज़े की बात ये कि 'याद' लफ़्ज़ को अगली ग़ज़ल में न लाने की हिदायत देकर खुद ही ऐसा मिसरा पकड़ा गया जिसमें 'याद' लफ़्ज़ मौजूद था। आहिस्ता-आहिस्ता शेर हुये, उस आवारा मिसरे को भी बाँधा मगर ग़ज़ल मुकम्मल होने के बाद दिल मुताबिक न पा कर आखिर में हटा दिया। ये थी इस ग़ज़ल की जर्नी जो अब आपसे मुख़ातिब है ...

(वासुदेव एस गायतोंडे की एक पेंटिंग )

हमारे सब्र का वो खूबसूरत पल निकल आये
वो अपने दोस्तों के साथ गर पैदल निकल आये

जवां इस उम्र की ड्योढ़ी पे जब उसने कदम रक्खे
बढ़ाने दोस्ती गालों पे कुछ पिम्पल निकल आये

ये नैनीताल है साहब, मकानों से यहाँ ज़्यादा
गली-कूचों में टपरी से कई होटल निकल आये

जमी जब चौकड़ी यारों की सालों बाद तो फिर से
खुले यादों के बक्से और गुज़रे पल निकल आये

अंगीठी-कोयले में दोस्ती बढ़ने लगी जब कुछ
दिखाने रौब फिर संदूक से कम्बल निकल आये

पुकारें आसमां को दीं, झुलसती फस्ले ने जब तो
बँधाने आस थोड़ी स्याह से बादल निकल आये

छुपाये बैठा था पत्तों में बूढ़ा पेड़ आमों को
हवा की इक शरारत से छिपे सब फल निकल आये

बयारें ताज़गी की फिर सुख़न में आ गईं देखो
नई इक सोच ले कर फिर कई पागल निकल आये

अभी तक तो उसे ही पूजते आये थे सब, लेकिन
उसी के कद बराबर अब कई पीपल निकल आये

इसी उम्मीद पे जी लो 'सफ़र' क्या ख़बर किसको !
तुम्हारे आज से बेहतर तुम्हारा कल निकल आये

[दस्तक - ग़ज़ल संकलन में प्रकाशित]

24 September 2012

ग़ज़ल - शहद सी बोलियाँ लब चढ़ी हैं प्रिये

आज जिस ग़ज़ल से आप का तआरुफ़ करवाने जा रहा हूँ, मुमकिन है आप उस ग़ज़ल से 'सुबीर संवाद सेवा' में आयोजित तरही मुशायरे में भी मिल चुके होंगे। 
ये भी सच है कि पहली मुलाक़ात ही दूसरी बार मिलने का सबब बनती है। 



गो मुलाकातें अपनी बढ़ी हैं प्रिये 
फिर भी कुछ आदतें अजनबी हैं प्रिये 

उजला-उजला सा है तेरा चेहरा दिखा
ख़्वाब की सब गिरह जब लगी हैं प्रिये

ज़िक्र जब भी तेरा इस ज़ुबां से लगा
शहद सी बोलियाँ लब चढ़ी हैं प्रिये

यूँ लगे जैसे तेरे तसव्वुर में भी
खुश्बुएँ मोगरे की गुँथी हैं प्रिये

दो निगाहें न उल्फ़त छिपा ये सकी
आहटें दिल तलक जा चुकी हैं प्रिये

खैरियत सुन के भी चैन पड़ता नहीं
फ़िक्र में चाहतें भी घुली हैं प्रिये

ले कई आरजू दिल की दहलीज़ पर
प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये

************
गो:- यद्दपि
गिरह:- गाँठ
तसव्वुर:- ख़याल

22 August 2012

ग़ज़ल - दोस्त से बढ़ के देखिये मुझको

एक ग़ज़ल कहने की कोशिश की है, कुछ शेर बुन लिए है मगर लगता है अभी इस रदीफ़ और काफिये पर कुछ शेर और भी बुने जा सकते हैं। जब तक मैं उन आने वाले शेरों की खैर-मक़दम में लगता हूँ तब तक आप इन शेरों को पढ़िए। आप, अपनी पसंद या नापसंद से वाकिफ़ ज़रूर करवाइयेगा। अरुज़ियों से माफ़ी क्योंकि मतले में ईता का दोष बन रहा है।

दोस्त से बढ़ के देखिये मुझको
आप यूँ भी तो सोचिये मुझको

उसकी आदत ग़ज़ल के मिसरे सी
कह रहा है निभाइये मुझको

मैं उसे मिल भी जाऊं मुमकिन है
वो मुहब्बत से गर जिये मुझको

तेरी यादों में एक कोना भर
सिर्फ इतना ही चाहिए मुझको

कट गई है पतंग शोहरत की
आप भी आके लूटिये मुझको

तोहमतों और नसीहतों के साथ
कुछ दुआएं भी दीजिये मुझको

बस हटा कर मेरे तख़ल्लुस को
शेर मेरा सुनाइये मुझको

04 July 2012

ग़ज़ल - अपने वादे से मुकर के देख तू

आहिस्ता-आहिस्ता मुंबईया बारिश, शहर को अपनी उसी गिरफ्त में लेती जा रही है, जिसके लिए वो मशहूर है। यकीनन इस दफ़ा कुछ देर ज़रूर हुई मगर उम्मीद तो यही है कि बचे-खुचे वक़्त में उसकी भी कोर कसर  पूरी हो जाएगी। अगर आपके शहर में बारिश नहीं पहुंची है तो जल्दी से बुला लीजिये और अगर पहुँच चुकी है तो लुत्फ़ लीजिये।

 ('जुहू बीच' पर कुछ बेफ़िक्र लहरें )
फिलहाल तो मैं यहाँ पर आप सब के लिए अपनी एक हल्की -फुल्की ग़ज़ल छोड़े जा रहा हूँ। पढ़िए और बताइए कैसी लगी? 

अपने वादे से मुकर के देख तू
फिर गिले-शिकवे नज़र के देख तू

इक नया मानी तुझे मिल जायेगा
मेरे लफ़्ज़ों में उतर के देख तू

कोई शायद कर रहा हो इंतज़ार
फिर वहीं से तो गुज़र के देख तू

हर किनारे को डुबोना चाहती
हौसले तो इस लहर के देख तू

ज़िन्दगी ये खूबसूरत है बहुत
हो सके तो आँख भर के देख तू

ख़्वाब की बेहतर उड़ानों के लिए
नींद के कुछ पर कतर के देख तू

फूलती साँसें बदन की कह रहीं
आदमी कुछ तो ठहर के देख तू

कह रही 'ग़ालिब' की मुझ से शायरी
डूब मुझ में फिर उभर के देख तू

22 May 2012

ग़ज़ल - समझौतों से समझौता कर बैठे हैं

कभी-कभी किसी ख़याल को पकड़ना, किसी साये को पकड़ने जैसा लगता है। वो अपना भी हो सकता है और पराया भी। वो ख़याल जिसके पैदा होने या ख़त्म होने के बारे में फ़िज़ूल की कई बहसें भी की जा सकती हैं, और यक़ीनन की भी जाती हैं। जबकि ये ख़याल  भी तो एनर्जी की तरह हैं जो एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलते रहते हैं। वैसे ही जैसे कभी कोई ख़याल लफ़्ज़ का जामा ओढ़ कर ग़ज़ल बन जाता हैं तो कभी गीत तो कभी कुछ और ........


समझौतों से समझौता कर बैठे हैं
क्या करने निकले थे, क्या कर बैठे हैं

शब की गिरहें खोलेंगे ये सोचा था
नीदों से आँखें उलझा कर बैठे हैं

फर्क़ नहीं अब कुछ बाकी हम दोनों में
अपना लहजा भी तुझ सा कर बैठे हैं

भूल गए असली शक्लें धीर-धीरे
लोग मुखौटों को चेहरा कर बैठे हैं

आज मुखालिफ़ है अपना साया तक भी
हम कितना ख़ुद को तन्हा कर बैठे हैं

आज ख़रीदी झोली भर के खुशियाँ पर
कूवत से ज़्यादा खर्चा कर बैठे हैं

सिर्फ गरज के आस बंधा जाते हैं इक
ये बादल कुछ तो सौदा कर बैठे हैं

दुनिया की नज़रों में ऊँचा उठने में
ख़ुद को ख़ुद से भी छोटा कर बैठे हैं

[प्रगतिशील वसुधा के जुलाई-दिसम्बर 2012 अंक में प्रकाशित]

11 April 2012

ग़ज़ल - जिस्म से बूंदों में रिसती गर्मियों की ये दुपहरी

ऐसा लग रहा है जैसे सूरज टुकड़े-टुकड़े होकर ज़मीन पर गिर रहा है। वैसे तो ये हर साल का किस्सा है, मगर इस दफे तो थोडा वक़्त से पहले ही आग़ाज़ हो चुका है। आहिस्ता आहिस्ता बढ़ती तपिश, नमी के साथ मिलके साजिशें रचना शुरू कर चुकी है। अब तो बरसात का इंतज़ार है। 

 फोटो - निखिल कुंवर
गर्मियों की दुपहरी के कुछ रंग अपने अंदाज़ से पिरोने की कोशिश की है, पढ़िए और बताइए वो कोशिश कितनी कामयाब हो पाई  है। 

जिस्म से बूंदों में रिसती गर्मियों की ये दुपहरी
तेज़ लू की है सहेली गर्मियों की ये दुपहरी

शाम होते होते सूरज की तपिश कुछ कम हुई पर
चाँद के माथे पे झलकी गर्मियों की ये दुपहरी

भूख से लड़ते बदन हैं, सब्र खोती धूप में कुछ
हौसले है आज़माती गर्मियों की ये दुपहरी

बर्फ के गोले लिए ठेले से जब आवाज़ आये
दौड़ नंगे पाँव जाती गर्मियों की ये दुपहरी

उम्र की सीढ़ी चढ़ी जब, छूटते पीछे गए सब
क्यूँ लगे कुछ अजनबी सी गर्मियों की ये दुपहरी

छाँव से जब हर किसी की दोस्ती बढ़ने लगी तो
और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की ये दुपहरी

आसमां अब हुक्म दे बस, बारिशें दहलीज़ पर हैं
लग रही मेहमान जैसी गर्मियों की ये दुपहरी