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26 May 2015

ग़ज़ल - युग बदलती सोच की सौगात के

जब हम बार-बार ये सोचते हैं कि किसी ख़ास शख़्स या शै के बारे में बिलकुल भी न सोचें, तो हम ख़ुद को उन्हीं गलियों की तरफ मोड़ते हैं जहाँ हम जाना नहीं चाहते, मगर चाहते हैं कि जायें। अपने को बेहतर तरीके से जानने के लिए, ये 'न चाहना' का 'चाहना' ज़रूरी भटकाव है, शायद !


युग बदलती सोच की सौगात के 
रंग बदले-बदले हैं देहात के 

ख़्वाहिशें मेरी मुसलसल यूँ बढ़ीं 
हो गईं बाहर मेरी औक़ात के 

अलविदा जब दिन ने सूरज को कहा 
शाम ने परदे गिराये रात के 

ख़ामुशी कसने लगी है तंज अब 
रास्ते कुछ तो निकालो बात के 

कुछ दिनों तक मन बहकने दो ज़रा 
ख़्वाहिशों पर रंग हैं जज़्बात के 

खेलने के बस तरीके बदले हैं 
खेल तो वैसे ही हैं शह-मात के 

गोधरा पर ट्रेन जब ठहरी ज़रा 
घाव फिर ताज़ा हुये गुजरात के 

मुश्किलें बेहतर बतायेंगी 'सफ़र'
लोग कितना साथ देंगे साथ के 

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Painting (Checkmate) by Andrea Banjac 

04 July 2012

ग़ज़ल - अपने वादे से मुकर के देख तू

आहिस्ता-आहिस्ता मुंबईया बारिश, शहर को अपनी उसी गिरफ्त में लेती जा रही है, जिसके लिए वो मशहूर है। यकीनन इस दफ़ा कुछ देर ज़रूर हुई मगर उम्मीद तो यही है कि बचे-खुचे वक़्त में उसकी भी कोर कसर  पूरी हो जाएगी। अगर आपके शहर में बारिश नहीं पहुंची है तो जल्दी से बुला लीजिये और अगर पहुँच चुकी है तो लुत्फ़ लीजिये।

 ('जुहू बीच' पर कुछ बेफ़िक्र लहरें )
फिलहाल तो मैं यहाँ पर आप सब के लिए अपनी एक हल्की -फुल्की ग़ज़ल छोड़े जा रहा हूँ। पढ़िए और बताइए कैसी लगी? 

अपने वादे से मुकर के देख तू
फिर गिले-शिकवे नज़र के देख तू

इक नया मानी तुझे मिल जायेगा
मेरे लफ़्ज़ों में उतर के देख तू

कोई शायद कर रहा हो इंतज़ार
फिर वहीं से तो गुज़र के देख तू

हर किनारे को डुबोना चाहती
हौसले तो इस लहर के देख तू

ज़िन्दगी ये खूबसूरत है बहुत
हो सके तो आँख भर के देख तू

ख़्वाब की बेहतर उड़ानों के लिए
नींद के कुछ पर कतर के देख तू

फूलती साँसें बदन की कह रहीं
आदमी कुछ तो ठहर के देख तू

कह रही 'ग़ालिब' की मुझ से शायरी
डूब मुझ में फिर उभर के देख तू

03 March 2009

ग़ज़ल - खिलखिला कर कैसे हँसतें हैं भला

आप सबको मेरा नमस्कार................
काफी दिनों के बाद एक ग़ज़ल लगा रहा हूँ, कुछ व्यस्तताओं में घिरा हुआ था मगर अब कोई शिकायत का मौका नही दूंगा।
बहरे रमल मुसद्दस महजूफ (२१२२-२१२२-२१२)

अब के जब सावन घुमड़ कर आएगा।
दिल पे बदली याद की बरसाएगा।
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मन से अँधियारा मिटेगा जब, तभी
अर्थ दीवाली का सच हो पायेगा।
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दूसरे की गलतियाँ तो देख ली,
ख़ुद को आइना तू कब दिखलायेगा।
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अपने बारे में किसी से पूछ मत,
कोई तुझको सच नही बतलायेगा।
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धुन में अपनी चल पड़ा पागल सा है,
दर बदर अब मन मुझे भटकायेगा।
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गर्दिशों में छोड़ देंगे सब तुम्हे,
प्यार माँ का संग चलता जाएगा।
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वोट जब मन्दिर के मुद्दे पर मिलें,
कौन मुदा भूख का भुनवायेगा।
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खिलखिला कर कैसे हँसतें हैं भला,
अब तो बच्चा ही कोई सिखलाएगा।
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ये जो हैं आतंकवादी जानवर,
कौन मानवता इन्हे सिखलाएगा।
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तीन रंगों पर लगेगा दाग एक,
भूख से बच्चा जो चूहे खायेगा।
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हम भी सुन कर के चले आए "सफ़र",
आज वो गज़लें हमारी गायेगा.
(गुरु जी के आशीवाद से कृत ग़ज़ल)