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30 June 2011

एक मुकम्मल शाम - नवोन्मेष महोत्सव २०११ "कवि सम्मलेन-मुशायेरा"

वो वक़्त का टुकड़ा जो सिद्धार्थनगर में नवोन्मेष महोत्सव २०११ के कवि सम्मलेन-मुशायेरे के लिए ही शायद तय हुआ था. २५ जून की शाम का अंदाज़ और मिज़ाज कुछ अलग सा था. मुंबई से सिद्धार्थनगर पहुँचने का सफ़र जो अपने में एक मुकम्मल सफ़र था, ख़ुद में एक दिन और दो रातें समेटे हुआ था , वो भी शायद इसी वक़्त के इंतज़ार में था.

यूँ तो ये सफ़र लम्बा बहुत था मगर लम्बा कहीं से भी नहीं लगा, भोपाल से गुरु जी का साथ, कानपुर से रविकांत भाई और लखनऊ से कंचन दीदी, इस सफ़र में जुड़े. इस सफ़र का वो एक दिन जो बाहर मौसम की बरसात में महक रहा था वही ट्रेन में गुरु जी के ज्ञान से भीनी-भीनी खुश्बू दे रहा था. 
उस पूरे दिन में यूँ तो हर लम्हा सहेजने लायक है मगर एक दिलचस्प किस्सा जो गुरु जी को हमेशा याद रहेगा कुछ अलग ही रंग लिए था, बातों ही बातों में कई मुद्दे छिड़े, कई बातें निकली, और सब कुछ सुहावना बन गया.


सिद्धार्थनगर में अज़ीज़ों का जमावड़ा एक अलग ही रंग लिए हुए था, और शाम को इन सब अज़ीज़ों के साथ-साथ जनाब राहत इन्दौरी साब के साथ मंच साझा करने का जूनून अपने अलग ही चरम पे था. इस बेसब्री को कम करते हुए शाम भी जल्दी ही आ गयी. बहुत अच्छा कार्यक्रम रहा, नवोन्मेष संस्था के अध्यक्ष विजित सिंह ने अपने साथी दोस्तों के साथ आयोजन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, और उनके साथ में वीनस भाई भी तन मन से सिद्धार्थनगर में पिछले एक-दो दिनों से लगे हुए थे. ये मुलाकात, ये लम्हा ज़िन्दगी की डाइरी में एक यादगार और खूबसूरत लम्हें की शक्ल में दर्ज हो चुका है.


एक मतला और चंद शेर जो नवोन्मेष महोत्सव में आयोजित कवि सम्मलेन-मुशायेरे में सुनाये थे, आपके लिए हाज़िर हैं;
नए सांचे में ढलना है अगर तो फिर बदल प्यारे.
तू अपनी सोच के पिंजरे से बाहर अब निकल प्यारे.

झुकाएगा नहीं अब पेड़ अपनी शाख पहले सा,
तेरी चाहत अगर इतनी है ज़िद्दी तो उछल प्यारे.

सड़क पर हम भी उतरेंगे, हमारी भी हैं कुछ मांगें
नया फैशन है निकला देश में ये आजकल प्यारे.

(चलते-चलते एक बात और, गौतम भैय्या और मुझे हम दोनों के काव्य-पाठ के लिए गुरु जी की तरफ से एक ख़ास, या यूँ कहें कि बेहद ख़ास तौहफा मिला है जो किसी और से साझा नहीं किया जा सकता इसलिए वो क्या है उसके बारे में पूछने की कोशिश करना फ़िज़ूल ही जायेगा, आप बस रश्क कर सकते हैं.)

15 March 2010

मेरे कुछ आवारा साथी

कुछ ज्यादा ही ख़ामोशी हो गयी इन दिनों इस ब्लॉग से मगर आज ये ख़ामोशी मेरे कानों में जोर से चीख के गयी है. चलिए इस चुप्पी को तोडा जाये. बिना पोस्ट के दोस्तों कौन सा मुझे अच्छा लग रहा था मगर वक़्त था कि इजाज़त ही नहीं देता था मगर आज बहुत मिन्नतों से माना है. 

मुंबई की ज़िन्दगी में किसी भी चीज़ की कमी नहीं है और आप तकरीबन हर चीज़ खरीद भी सकते हो मगर कमबख्त वक़्त नहीं. इसी ज़िन्दगी का एक हिस्सा अब मैं भी बन गया हूँ वैसे तो ये एक बहाना ही है नहीं लिखने का लेकिन अगर सच का चश्मा पहन के देखता हूँ तो दिखता है कि लिखने के लिए कुछ ख्याल ही नहीं थे और जो ज़ेहन में आ भी रहे थे उनको लिख के कलम से गद्दारी करने की गवाही ये दिल मुझे नहीं देता था. सुबह घर से ऑफिस और शाम को ऑफिस से घर की भागमभाग नए ख्यालों को कोई शक्ल नहीं दे पा रही थी कुछ आता भी तो लोकल की भीड़ में आके खो सा जाता था. 

अब ज़िक्र लोकल का आ ही गया है तो कुछ उसके बारे में भी कहता चलूँ, मुंबई की लोकल (लोकल ट्रेन) का सफ़र जो पहली दफा करेगा वो तो तौबा तौबा करने लगेगा अरे सफ़र करना तो दूर की बात रही उसकी सिम्त देख भी ले तो चढ़ने से घबरा जायेगा और सोचेगा चलो यार बस से निकला जाये या फिर ऑटो की  सवारी कर लें. कुछ ऐसा ही शुरू में मेरे साथ भी हुआ था मगर अब तो उसका भी मज़ा आने लगा है, वो लपक के ट्रेन में चढ़ना और आपके पीछे की भीड़ अपना पूरा ज़ोर आपके ऊपर लगाके दो क़दमों को रखने लायक जगह बना देती है, अपने लिए भी, आपके लिए भी. जब सांस लेने का मन करे तो सर ऊपर उठा के वो भी ले लो लेकिन पहले तो इस रस्साकशी को देख के ही घबराहट हो जाती थी वो दरवाजे के बाहर निकली लोगों २ सतहें (अन्दर का मंज़र छोडिये), बस एक सिरा पकड़ लो और सवार हो जाओ बाकी सब कुछ गर्दी (भीड़ )कर देगी, अगर उतरना है तो गर्दी उतार भी देगी और अगर इस गर्दी का मन नहीं किया तो आप अपने स्टॉप से एक या दो स्टॉप आगे उतरोगे.

लगता है हर कोई भाग रहा है और भागे जा रहा है...........और आपको भी भागना पड़ेगा नहीं तो पीछे वाले आपको भगाते हुए अपने साथ ले चलेंगे, इतना ख्याल यहाँ सब लोग एक दुसरे का रखते हैं. इतनी भीड़ है मगर एक तन्हाई सी पसरी रहती है हर कोई इंतज़ार कर रहा होता है कि कब उसका स्टॉप आये और वो इस पिंजरे से छूट के अपनी दुनिया कि ओर उड़ चले. कोई अपने में गम है तो कोई रेडियो FM में बजते हुए गानों की धुनों में सर घुमा रहा है क्योंकि पैर को हिलाने की इजाज़त नहीं है, कोई भगवान् को याद कर रहा है (हनुमान चालीसा, बाइबिल, क़ुरान की आयतें आदि पढ़ रहा है), कोई अखबार के सहारे समाज से रूबरू हो रहा है, तो कोई ग़ज़ल सोच रहा है (मैं).........................
इसी उधेरबुन में, एक अशआर बना था जिससे अब आप सब भी रूबरू हो जाइये.

शाम सवेरे करता रहता दीवारों से पागल बातें.
मेरे कुछ आवारा साथी, तेरे ख़त औ' तेरी यादे.
जिसको देखो ख़ुद में गुम है कैसा शहर "सफ़र" ये तेरा
आदम तो लगते हैं लेकिन चलती फिरती जिंदा लाशें.

जल्द ही आता हूँ एक ग़ज़ल के साथ...................अरे सच कह रहा हूँ इस बार ये जल्दी एक महीने से पहले आ जाएगी.

25 June 2009

दास्ताँ-ए-बारिश और चंद शेर

मुंबई में बारिश ने दस्तक दे दी है और मेरे घर पे कुछ खास अंदाज़ में दी है। अपने नए मेहमान का इस्तकबाल कुछ खास तरीके से किया जिसे वो शायद भुला ना पाए। हर शनिवार और रविवार को ऑफिस में काम करना मना है सीधे कहूं तो छुट्टी है। मैं इसी मौके का फायदा उठा कर अपने दोस्तों से मिलने निकल जाता हूँ, और वापसी होती है रविवार की रात को। दोस्तों के साथ रिमझिम बरस रही बारिश की बूंदों का लुत्फ़ उठाया तो बचपन की पुरानी यादें ताज़ा हो गई, याद आ गए वो दिन जब भीगने के बहाने ढूँढा करते थे और घर में भीगने में डांठ इंतज़ार करती थी. इसी मौज़ूँ पे लिखा हुआ एक शेर याद आ रहा है.........
"माँ की डांठ नही भूले,
जब बारिश में भीगे थे."
मलाड से वापसी पे मौसम बहुत सुहाना था, हवा ने ताज़गी की चादर ओढ़ ली थी और वो एक खूबसूरत एहसास दे रही थी। अपने ठिकाने की ओर बढता हुआ जब कमरे की सिम्त जा रही सीढियों पे चढ़ रहा था तो उनपे लिपटी हुई मिटटी और गुज़रे हुए लोगों के क़दमों के निशाँ गवाही दे रहे थे की आज बारिश ने लोगों को एक सुकून भरी साँस दी है, रोज़ की चिलचिलाती धूप से।
शायद बारिश ने मेरी ब्लॉग पे की गई पिछली पोस्ट पढ़ी होगी "घर में कोई मेहमां आने वाला है...." और सोचा होगा चलो इसके घर पे दस्तक दे ही दूँ, बेचारा किसी को पुकार रहा है। घर का दरवाजा खोला तो पहली नज़र में कुछ नज़र नही आया क्योंकि कमरे में बिखरा अँधेरा मुझे देखने की इजाज़त नही दे रहा था मगर जैसे ही रौशनी ने उसके इरादे रोके और आंखों को खुल के देखने की रास्ता दिया तो एक अलग ही मंज़र था उन बेबस नज़रों के सामने.............
........कमरे में आया हुआ पानी मुस्कुरा के कह रहा था कैसे हो, दो दिन मज़े में काट के आ गए अब और मज़े लो, वैसे ज़्यादा कुछ सामान तो अभी जोड़ा नही मगर जितना भी था वो मेरी ज़रूरत के हिसाब से बहुत था मगर पानी अपनी बाहों में भर के उन सब का बोसा ले रहा था और उसके शिकार हुई मेरी डायरी, मेरे सोने का गद्दा और कुछ बदनसीब कागज़। बस अब एक ही काम रह गया था पानी को बा-इज्ज़त उसका सही रास्ता दिखने का। वो रात तो लिखी थी फर्श के नाम और सोने का अब वो ही ठिकाना था..............मगर उसका भी एक अलग मज़ा था जो ज़िन्दगी भर एक याद बन के जिंदा रहेगा और आगे सम्हल के रहने की हिदायत देगा मुंबई की बारिश से।

इस पोस्ट को इसके अंजाम तक पहुँचने से पहले, दो आज़ाद शेरों को आपके हवाले कर रहा हूँ................

"बोलने के झूठ सब आदी हुए यारों,
बिन बनावट सच कहाँ बेबाक आए है
फ़ोन ने, -मेल ने लम्हें हसीं छीने,
प्यार का वो ख़त कहाँ अब डाक आए है।"
aa

28 November 2008

अमनों-सुकू का होगा इम्तेहान कब तलक?

"इस अमनों-सुकू का होगा इम्तेहान कब तलक?
ये जेहाद लेगा मासूमों की जान कब तलक?"

बहुत से सवाल अब भी अपने जवाब की तलाश में हैं?
क्या हम कुछ सीख पाएंगे या फ़िर सब भूल कर अगले सबक (बम विस्फोट) का इंतज़ार करेंगे और हर बार की तरह शहीदों के बलिदान को टीका टिप्पणियों तक सिमटा देंगे?

02 October 2008

बापू के लिए ...............

वक्त की सिलवट में रहे माज़ी की खुशबू।
आज भी ताज़ा सी है, आज़ादी की खुशबू।
महकता है हिंदोस्ता, जब महकती है,
अनगिनत वीरों और एक गाँधी की खुशबू।

27 September 2008

समेटो रौशनी अभी चिराग...............

समेटो रौशनी अभी चिराग, बुझने के लिए।
उजाले आफताब के खड़े उलझने के लिए।

मुकम्मल तुम करो अभी यहीं पे लड़ के हार को,
हमारे हौसले जवाब हैं, समझने के लिए।

11 August 2008

खाई हैं ठोकरें....

खाई हैं ठोकरें तभी तो सम्हला हूँ आगे।
लड़ा हूँ ज़माने से और निकला हूँ आगे।

मुझको मुश्किलों ने बना तो दिया पत्थर,
जज़्बात जब कभी भी छुए पिघला हूँ आगे।

28 January 2008

मेरा पहला कलाम, आप सभी को सलाम.

दोस्तों, आप सभी को अंकित "सफ़र" का सलाम।
ये मेरी एक कोशिश है जिसके तहत मैं अपनी गजलों, शेरों, कविताओं और नज्मों से आपको रूबरू करवाउंगा। मैं शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ मोहन "मुन्तजिर" का जिनकी शागिर्दी में मैंने काफी कुछ सीखा और उन्होंने मुझे छोटी छोटी बारीकियों से बवास्ता करवाया। मैं शुक्रगुजार हूँ अपने शायर दोस्तों मुस्तफा "माहिर" और अरुण "मासूम" का जिनके साथ मैंने अपनी शायरी को निखारा और उन्होंने कदम कदम पे मेरा साथ दिया।

मगर एक बात जो की कहना बहुत ज़रूरी है वो बात है उस जगह की जहाँ मेरा जन्म हुआ है, जिसकी मिटटी में मैं खेला हूँ,पला हूँ बड़ा हुआ हूँ और सिर्फ़ मेरे लिए ही नहीं ये बात मेरे दोस्तों के लिए भी सच है उस पंतनगर की सरज़मी ने हम लोगों को बहुत कुछ दिया है और हम उसे कभी भूल नहीं सकते।


वैसे कहने को तो बहुत बातें हैं और वो मैं कहूँगा भी और लिखूंगा भी, बस आपको भी थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा क्योंकि अब आपके और मेरी शायरी की बीच जो दूरियां थी वो दूर हो गई हैं।

चंद मिसरे आप सभी के लिए .............................

आप सब जो हैं मिरे, सलाम लिख रहा हूँ।
राज़ दिल के आज मैं तमाम लिख रहा हूँ।

दिल मिरा है इंतज़ार में किसी हसीं के,
मुद्दतों से मुद्दई, वो शाम लिख रहा हूँ।