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31 December 2013

After thoughts - Lunchbox (Part - 2)

इस गुज़रते साल में सिनेमा ने अपने सौ साल पूरे किये। सौ साल के इस नटखट बच्चे ने इस साल पाँव उचका कर कई चीज़ें छूने की कोशिश की और छूने में कामयाब भी रहा। इन्हीं सब सिनेमाई कामयाबी में रितेश बत्रा की "लंचबॉक्स" भी आई। मुम्बई में जाती हुई लोकल को पकड़ने का रोमांच वो भी भागते हुए  …. रोमांच के साथ-साथ रोमांस भी लिये होता है। रितेश बत्रा की ''लंचबॉक्स'' के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। मुझे फिल्म थिएटर में देखनी तो थी मगर वक़्त नहीं मिल पा रहा था। और १ अक्टूबर २०१३ को लगा बस ये शायद आखिरी मौका हो क्योंकि bookmyshow पर २ अक्टूबर २०१३ की फ़िल्मी खिड़कियाँ "बेशरम" हो चुकी थी, और शर्म से उभर भी न पाई फिर। ख़ैर छोड़िये  ...........

कोई माने न माने लेकिन हर शहर अभिशप्त होता है एकाकीपन के लिये, और उस में रह रहे लोग उस श्राप को मिटाने की कोशिशों में समय के साथ-साथ ख़ुद भी श्रापित हो जाते हैं। ये फ़िल्म इसी श्राप को प्राप्त मुम्बई के अनजान चेहरों और ज़िंदगियों में से कुछ-एक की ज़िन्दगी को टटोलने की कोशिश करती है। मेरे ख़याल से किसी भी फ़िल्म को महान उसके कलाकार नहीं, उसके सह-कलाकार बनाते हैं (मुख्य कलाकार तो बनाते ही हैं यार) और इस फ़िल्म में वो काम 'देशपांडे आंटी' और 'शेख़' ने किया है। बिलकुल वैसे ही जैसे आलू-गोभी की सब्जी का स्वाद आलू-गोभी नहीं, उस में पड़े मसाले और उप्पर से छिड़की गई धनिये की पत्तियाँ बढ़ाती हैं। अब बात शेख़ की, नवाज़ुद्दीन अपने क़िरदार में पानी की तरह उतरते हैं और अपनी उपस्थिति से स्वादिष्ट दाल में तड़का लगाने का काम करते हैं।

इला के क़िरदार में निमृत ऐसी घुली हैं कि जहाँ पर इला निमृत हो गई हैं और निमृत इला। इला की दिनचर्या एक आम घरेलू औऱत के जीवन का एक ऐसा हिस्सा है जिसमें सारी चीज़ें सलीके से एक टिन के डब्बे रखकर हरे-नीले से दिखने वाले बैग में डालकर डब्बेवाले को पकड़ा दी जाती हैं ताकि वो शहर के दूसरे हिस्से में किसी अपने की भूख मिटा सके। दरअसल हर गृहणी अपने पति को खाने के साथ-साथ अपनी ज़िन्दगी का एक हिस्सा भेजती है, एक निश्छल प्यार जो कभी पनीर की शक्ल में होता है तो कभी कोफ्ते की। भूरे रंग की ग्रेवी के उप्पर धनिये के पत्तों का छिड़काव निर्मल एहसास का छिड़काव होता है। मगर जीवन का सच तो ये है कि हम सब ज़िन्दगी में बड़ी सी दिखने वाली चीज़ों की तरफ़ भागते हैं, चाहे वो सैलरी हो, चाहे खुशियाँ हो या फिर ज़िन्दगी। एक बड़े लम्हें के इंतज़ार में कितने छोटे लम्हें कुर्बान हो जाते हैं हमें कभी अंदाज़ा ही नहीं होता।

फ़िल्म के एक दृश्य में जब इला,  देशपांडे आंटी के बताये हुए मैजिक ट्रिक को प्रयोग में ला कर डब्बे के लौटने के बेसब्र इंतजार में होती है और दरवाजे पर डब्बेवाले की आहट पाते ही लपक कर डब्बा उठाती है। उसे खोलकर देखने पर उमंग से भरी वह देशपांडे आंटी को बताती कि आंटी आज डब्बा चाट-पोंछकर खाया गया है। और जवाब में आंटी भी चहककर जवाब देती हैं कि “मैंने कहा था न, ये नुस्खा काम करेगा।” पति के आने पर उससे सुनने की कुछ आस लगायी हुई इला जब खुद निराश हो, लंच के बारे में पूछती है तो मशीन सा रटा-रटाया हुआ जवाब पाती है। बेपरवाह पति डब्बे में ‘आलू-गोभी’ होने की बात कह वहां से चला जाता है और इला उसे ये बता भी नहीं पाती कि उसका बनाया लंचबॉक्स उसे मिला ही नहीं है। उसकी बेरुख़ी को उसके उस वक़्त डोरी में टंगे कपड़े उतारने से बहुत अच्छे से समझा जा सकता है। जैसे वो तार से कपड़े नहीं सपने उतार रही हो। वो सपने जो सुबह-सुबह गीले-गीले एहसासों से उम्मीदों के तार पे डाले गए थे कि इन्हें जब पहना जायेगा तो इनके रंग कितने खिले हुए होंगे मगर वही सपने एक तेज़ धूप अपने रंग खो चुके हैं।

एक अच्छी फिल्म और एक अच्छे डायरेक्टर की ये ख़ासियत होती है कि वह आपके तयशुदा माइंडसेट को पकड़ लेते हैं और फिर उसे एक माइल्ड शॉक देते हैं और आप वहीं पर बंध जाते हैं। फ़िल्म में कई खूबसूरत दृश्य हैं उनमें से इरफ़ान के हिस्से आया हुआ वो जिसमें एक बार उन्हें इला के पत्र में आखिरी लिखी हुई पंक्ति मिलती है ‘तो किसलिए जिए कोई’ और अगली सुबह ऑफिस आते वक़्त ऑटोवाले से पता चलता है कि एक ऊँची इमारत से एक औरत अपनी बच्चे सहित कूद गई है। और इसी तरह सिगरेट छोड़ने की कोशिश करते हुए भी, जब अपनी बालकनी से दूसरी तरफ़ की खिड़की में से अंदर चहकती हुई चंद ज़िंदगियाँ देखते हैं ख़ासकर वो छोटी सी लड़की। वो छोटी सी दुश्मनी, साजन फर्नांडेस और बच्चों के बीच  ...... और महज़ व्यवहार में आये बदलाव से सुलह होना, कुछ हसीन पल दे जाती है। या फ़िर सड़क पर शेख़ के साथ वो स्केच आर्टिस्ट वाला दृश्य।

हम ज़िन्दगी में उन्हीं चीज़ों में खुशियाँ ढूंढने की कोशिश करते हैं जो हमें मिली हैं, लेकिन इन तथाकथित दायरों से बाहर निकलकर हमें अपनी पहचान और सुकून मिलता है जिसका बाइप्रोडक्ट खुशियाँ होती हैं। ऐसी पहचान ऐसा सुकून जिनका टिकट हमें वाया भूटान लेना पड़ता है। दरअसल हम सब अपने खोये हुए हिस्से तलाश रहे हैं।

03 October 2013

After thoughts - Lunchbox (Part -1)


आखिरी लोकल को पकड़ने का रोमांच वो भी भागते हुए  …. रोमांच के साथ-साथ रोमांस भी लिये होता है। रितेश बत्रा की ''लंचबॉक्स'' के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, फिल्म देखनी तो थी मगर वक़्त नहीं मिल पा रहा था। और १ अक्टूबर को लगा बस ये शायद आखिरी मौका हो क्योंकि bookmyshow पर २ अक्टूबर की फ़िल्मी खिड़कियाँ "बेशरम हो" चुकी थी।
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उप्पर खिंची इन डॉटेड लाइनस में अभी लिखना बाकी है, फुर्सत मिलते ही ''लंचबॉक्स' की खुशबू से इन्हें भरूँगा। फिल्म की खूबसूरती से भी खूबसूरत एहसास, मेरे पड़ोस वाली सीट पर फिल्म देखने बैठे एक युवा जोड़े को इस आखिरी छूटती लोकल को पकड़ते देखने का था, जो उम्र की शायद ५०-६० कड़ी जोड़ चुके होंगे।

फिल्म के बाद जैसे ही हॉल से बाहर निकला तो मुंबई की बारिश भिगोने को तैयार बैठी थी, बिना बताये आ धमकने वाली बारिश पे तब और खीज उठती है जब आप अपने बैग से अम्ब्रेला को ये सोचकर अलविदा कह चुके होते हैं कि अब तो बारिश गई। मगर आज एक चीज़ और अच्छे से जानने को मिली दरअसल बारिश आपके मूड पे डिपेंड करती है, और आज उसमें भीगना अच्छा लग रहा था। 

यूँ तो मुंबई के डब्बेवालों को "सिक्स सिग्मा" ऑफिशियली नहीं मिला है लेकिन एक अनुमान के अनुसार उनकी गलतियों की गुंजाइश ८ मिलियन में १ या यूँ कहें १६ मिलियन (क्योंकि डब्बे लौटकर वापिस भी आते हैं) में १ आंकी जा सकती है, जबकि "सिक्स सिग्मा" में एक मिलियन में ३.४ गलतियाँ स्वीकार हैं। रितेश बत्रा ने इस खूबसूरत गलती पर एक बहुत सशक्त फिल्म बुनी है, क्योंकि गलत पटरी पर चलने वाली ट्रेन भी सही जगह पहुँच सकती है। आज जबकि हमारी भावनायें छोटी-छोटी बातों को लेकर आहत हो जाती हैं, वहीं अभी तक अपने काम और धुन में डूबे डब्बेवालों ने फिल्म के ख़िलाफ कोई मोर्चा नहीं निकाला। एक सलाम उन्हें भी।

अच्छी फ़िल्में अपनी खुशबुओं से सबको सराबोर करती हैं, इस फिल्म के बरक्स दो मंज़र यहाँ भी पढ़े जा सकते हैं, जो इस फिल्म के ही एक्सटेंशन हैं।
  1. ह्रदय गवाक्ष पर कंचन सिंह चौहान दी
  2. जानकी पुल पर सुदीप्ति जी

11 October 2011

जन्मदिन मुबारक गुरु जी.......


यूँ तो हर दिन, महिना, साल अपने में कुछ ख़ास छिपाए रखता है और अपने हिस्से की कहानी का वो पहला गवाह व वजूद भी खुद ही होता है. लेकिन जब बात सन १९७५ की निकलती है तो कुछ बातें जिनकी जुगलबन्धी मेरे ज़ेहन से हो गई हैं, अचानक ही सांस लेने लगती हैं. उनमे से एक हिस्सा फिल्मों ने कब्ज़ा रखा है (शोले, आंधी और शोले की आंधी में जो माँ के चमत्कार से हिट हो पाई, जय संतोषी माँ सिर्फ यही तीनों याद आती हैं). अब इससे आगे बढ़ के साल और महीनो से फिसलकर अगर दिनों की ओर चलूँ तो १९७५ का एक दिन पहेली सा सामने आ कर खड़ा हो जाता है. वो है १५-५-७५ (पंद्रह पांच पिचहत्तर)? न जाने इस दिन में ऐसा क्या छिपा हुआ है जिससे गुलज़ार ने इसे अपनी नज्मों के ठिकाने का पता दे दिया. और पिछले तीन-एक सालों से मुझ से जुड़ा इसी १९७५ का एक और बहुत ही ख़ास दिन है ११-१०-१९७५ जो मेरी अधिकतर अबूझ और उटपटांग पहेलियों और ग़ज़लों की गुत्थमगुत्था का जवाब बन गया है. वो दिन है, मेरे श्रद्धेय गुरुवर पंकज सुबीर जी का जन्मदिन.

ऐसा क्या ख़ास है ११ अक्टूबर १९७५ में, वैसे कुछ भी तो नहीं, है तो बस ये ही कि आम दिनों से दिखने वाले इस दिन को आज से ३६ बरस पहले जन्मे पंकज पुरोहित नाम के शख्स ने, माँ सरस्वती के आशीर्वाद और अपनी कलम की धार से पंकज सुबीर के जन्मदिन के रूप में चिन्हित करवा दिया है.



अपनी कहानियों से पाठकों को, रचनाशीलता के सागर में गोते लगवाने वाले पंकज जी की पंकज पुरोहित से पंकज 'सुबीर' बनने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. पूरी कहानी कह पाना तो मेरे बूते की बात नहीं है, हाँ मगर उस कहानी से एक हिस्सा जो "सुबीर" तख्खलुस से जुड़ा हुआ है, आप सभी को बताता चलूँ.

बात तब की है, जब लेखनी ने रफ़्तार पकड़ ली थी, और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन शुरू हो चुका था. लेखक के नाम के रूप में अब भी नाम पंकज पुरोहित ही जा रहा था. रचनाएं, हिंदी साहित्य में अपना स्थान बना रही थी और साथ-साथ पाठकों द्वारा भी सराही जा रहीं थी. मगर, पाठकों के अधिकतर शुभकामना व बधाई पत्र, सीहोर के पंकज पुरोहित को नहीं वरन पंकज पुरोहित नाम से ही रचनाओं का सृजन कर रहे, एक दूसरे शख्स के पास पहुँच रहे थे. एक ही नाम और एक ही काम की ये विचित्रत्त्ता भी अनूठी थी. मगर, इस उलझन को सुलझाने का उपाय क्या?

(घुग्घू कहानी तो आपने पढ़ी होगी, ऐसे ही एक घुग्घू की तलाश में)


एक विचार ये सूझा कि पंकज पुरोहित में से सिर्फ पंकज नाम से ही आगे बढ़ा जाए लेकिन दूजे ही पल ये विचार कौंधा अगर पंकज पुरोहित नाम का कोई और भी शख्स हो सकता है तो पंकज नाम के साथ तो इसकी संभावनाएं और भी बढ़ जायेंगी! फिर इस बात का ये निष्कर्ष निकला कि वक़्त आ चुका है कि पंकज नाम में एक तख्खलुस जोड़ा जाए, लेकिन फिर वही यक्ष प्रश्न कि वो तख्खलुस अगर हो तो आखिर क्या हो, जो कम से कम किसी के नाम से आसानी से न मिलें और खासकर साहित्य में तो नहीं ही.

ये अगर-मगर की स्थिति उन्होंने एक दिन अपने बचपन के दिनों के मित्र के सामने रखी, तो मित्र हँस के बोला चलो अच्छा हुआ कि मैं इस स्थिति में आज तक नहीं फँसा. इस बात पर सवाल उठा कि भाई क्यों, आखिर ऐसा क्या है तुम्हारे नाम में! तो मित्र बोला, ये बात तो मैं भी नहीं जानता, हाँ लेकिन मुझे आज तक मेरे नाम से मिलता कोई दूसरा शख्स नहीं मिला. चाहे तो तुम भी ढूंढ के देख लो, मिल जाए तो मुझे भी बताना. बात आई-गई होते-होते रह गई. वाकई कुछ दिनों की माथा-पच्ची के बाद भी दोस्त के नाम से मिलता खोजे न खोजते कोई शख्स न मिला. अगली मुलाकात में उस मित्र से बोले कि वाकई तेरे नाम से मिलता कोई दूसरा नाम नहीं मिला और इसी बीच मेरी भी तख्खलुस की तलाश पूरी हुई, मुझे अपना तख्खलुस मिल गया है. मित्र ने कहा ये तो बहुत अच्छा हुआ, वैसे तुने तख्खलुस क्या रखा है? तो जवाब आया, तेरे नाम से बेहतर और क्या मिलता इसलिए मित्र सुबीर तेरे ही नाम को अपना तख्खलुस "सुबीर" बना लिया है. अब ये बता, पंकज 'सुबीर' जँच रहा है न!




अरे जाते-जाते याद आया आज तो फिल्मों के शहंशाह का भी जन्मदिन है. चलते-चलते, "सदी के महानायक उर्फ़ कूल-कूल तेल के सेल्समैन" को भी जन्मदिन की शुभकामनाएं.

09 September 2011

बीते दिनों.........


इस ब्लॉग को चुप्पी ओढ़े कई दिन बीते, या थोडा अच्छे से हिसाब लगाया जाए तो एक-आध महीने ऊपर हो गए थे तो सोचा क्यों ना इस तरह पसर के बैठी हुई इस ख़ामोशी को तोडा जाए. हाँ, इसे तोडा जाए मगर आखिर किस से, किसी ग़ज़ल से या कुछ बातों से या उन सबसे इतर किसी और चीज़ से.


ग़ज़लगोई से अलग, बीते दिनों भारतीय फिल्म डिविसन के लिए एक Eye Donation Campaign के लिए कुछ लिखने का मौका मिला तो कुछ कहने की कोशिश की थी, एक अच्छे प्रयास के लिए कुछ लफ्ज़ दिए थे, आज उसी से आपको रूबरू करवा रहा हूँ. इस के लिए खासतौर से शुक्रगुज़ार हूँ कमल दा और आशीष दा का.



संगीत और आवाज़ - अरनब चक्रबोर्ती
निर्देशन - शालिनी शाह
सिनेमैटोग्राफी - राजेश शाह व काकू दा



चलते-चलते आपके लिए, अभी पिछले महीने अगस्त महीने की २८ तारिख  को नैनीताल में Run2live संस्था द्वारा नैनीताल मानसून मैराथन का आयोजन किया गया. इस मानसून मैराथन में इस बार की थीम  "Care for the Old Age" थी.    इसी प्रयास  के लिए मैंने कलम से कुछ अल्फाज़ देने की  कोशिश की थी, गीत के बोल अंग्रेजी में हैं. आपके लिए ये गीत छोड़ जा रहा हूँ,   आप भी सुनिए और बताइए कैसा बन पड़ा है.





संगीतकार - कमल पन्त
आवाज़ - रवि चौधरी

इन दोनों गीतों के बोल अगर आपको ज़रा भी आपको पसंद आते हैं तो इसमें संगीतकार और गायक का भी उतना ही या उससे ज्यादा योगदान है जिन्होंने बहुत खूबसूरती और मिठास से इसमें जादू ला दिया है. साथ में पहले गीत में निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी ने लफ़्ज़ों को निखारने में एक अहम् किरदार निभाया है.

30 June 2011

एक मुकम्मल शाम - नवोन्मेष महोत्सव २०११ "कवि सम्मलेन-मुशायेरा"

वो वक़्त का टुकड़ा जो सिद्धार्थनगर में नवोन्मेष महोत्सव २०११ के कवि सम्मलेन-मुशायेरे के लिए ही शायद तय हुआ था. २५ जून की शाम का अंदाज़ और मिज़ाज कुछ अलग सा था. मुंबई से सिद्धार्थनगर पहुँचने का सफ़र जो अपने में एक मुकम्मल सफ़र था, ख़ुद में एक दिन और दो रातें समेटे हुआ था , वो भी शायद इसी वक़्त के इंतज़ार में था.

यूँ तो ये सफ़र लम्बा बहुत था मगर लम्बा कहीं से भी नहीं लगा, भोपाल से गुरु जी का साथ, कानपुर से रविकांत भाई और लखनऊ से कंचन दीदी, इस सफ़र में जुड़े. इस सफ़र का वो एक दिन जो बाहर मौसम की बरसात में महक रहा था वही ट्रेन में गुरु जी के ज्ञान से भीनी-भीनी खुश्बू दे रहा था. 
उस पूरे दिन में यूँ तो हर लम्हा सहेजने लायक है मगर एक दिलचस्प किस्सा जो गुरु जी को हमेशा याद रहेगा कुछ अलग ही रंग लिए था, बातों ही बातों में कई मुद्दे छिड़े, कई बातें निकली, और सब कुछ सुहावना बन गया.


सिद्धार्थनगर में अज़ीज़ों का जमावड़ा एक अलग ही रंग लिए हुए था, और शाम को इन सब अज़ीज़ों के साथ-साथ जनाब राहत इन्दौरी साब के साथ मंच साझा करने का जूनून अपने अलग ही चरम पे था. इस बेसब्री को कम करते हुए शाम भी जल्दी ही आ गयी. बहुत अच्छा कार्यक्रम रहा, नवोन्मेष संस्था के अध्यक्ष विजित सिंह ने अपने साथी दोस्तों के साथ आयोजन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, और उनके साथ में वीनस भाई भी तन मन से सिद्धार्थनगर में पिछले एक-दो दिनों से लगे हुए थे. ये मुलाकात, ये लम्हा ज़िन्दगी की डाइरी में एक यादगार और खूबसूरत लम्हें की शक्ल में दर्ज हो चुका है.


एक मतला और चंद शेर जो नवोन्मेष महोत्सव में आयोजित कवि सम्मलेन-मुशायेरे में सुनाये थे, आपके लिए हाज़िर हैं;
नए सांचे में ढलना है अगर तो फिर बदल प्यारे.
तू अपनी सोच के पिंजरे से बाहर अब निकल प्यारे.

झुकाएगा नहीं अब पेड़ अपनी शाख पहले सा,
तेरी चाहत अगर इतनी है ज़िद्दी तो उछल प्यारे.

सड़क पर हम भी उतरेंगे, हमारी भी हैं कुछ मांगें
नया फैशन है निकला देश में ये आजकल प्यारे.

(चलते-चलते एक बात और, गौतम भैय्या और मुझे हम दोनों के काव्य-पाठ के लिए गुरु जी की तरफ से एक ख़ास, या यूँ कहें कि बेहद ख़ास तौहफा मिला है जो किसी और से साझा नहीं किया जा सकता इसलिए वो क्या है उसके बारे में पूछने की कोशिश करना फ़िज़ूल ही जायेगा, आप बस रश्क कर सकते हैं.)

18 June 2010

मुद्दतों से मुद्दई ये मुलाक़ात लिख रहा था

यूँ तो इस बात को या कहें मुलाक़ात को बराबर २ हफ्ते होने वाले हैं मगर मेरी इस देरी से इस पर कोई फ़र्क नहीं पढने वाला है. मुंबई में झमाझम बारिश शुरू हो चुकी है, जिस बात का ज़िक्र पिछली पोस्ट में किया था, हाँ वो मानसून वाली फिल्म , हाँ वो लग चुकी है और लोग आनंदित भी हैं और परेशान भी.
लौटते हैं मुद्दे पर, किसी ने ठीक ही कहा है और जिसने ये कहा है ये पोस्ट भी उसी के बारे में है कि "मुंबई में अच्छे इंसान और अच्छी हिंदी की किताबें मिलना बहुत मुश्किल है", अगर ये मिलते भी हैं तो कुछ मेहनत के बाद नहीं नहीं काफी मेहनत के बाद या फिर आपकी किस्मत के सितारें नक्षत्रों के अच्छे दोस्त हो तब ही ये मुमकिन है, मैं नहीं जानता मेरे साथ कौन सा चमत्कार हुआ इनमे से या फिर वो कुछ और ही था मेरी सोच समझ से परे...............

दिनांक ४ जून, २०१० को ठीक ४ बजकर ५३ मिनट पे मेरे सेल-फ़ोन पर नीरज जी की कॉल की दस्तक हुई और बात हुई के बहुत दिन हो गए ब्लॉग और फ़ोन पे बतियाते अब आमने-सामने मिला जाए और दिन मुक़र्रर हुआ अगला दिन यानी ५ जून, २०१०, जगह खोपोली, मुंबई-पुणे रास्ते पे बसा एक खूबसूरत नगर.
बस फिर क्या, पहुँच गए खोपोली नीरज जी से मिलने, अब नीरज जी के बारे में कुछ कहूँगा तो लफ्ज़ कहेंगे कि बस इतना ही अरे ये तो तुमने इनके बारे में बताया ही नहीं, अरे तुम ये भी कहना भूल गए ................. इसलिए एक सुझाव है कि आप भी इनसे ज़रूर मिले वर्ना समझ लीजिये के कुछ अधूरा ही लगेगा और रहेगा भी.

नीरज जी से मिलने के साथ ही साथ मुलाक़ात हुई उनके द्वारा संजोये हुए किताबों के जखीरे से, जो उनके ब्लॉग पे संचालित किताबों की दुनिया की बुनियाद है, दिन तो हसीं हो ही गया था शब्दों के संसार में विचरण करके और शाम को खोपोली की सैर, सोने पे सुहागा हो गया. खोपोली बहुत खूबसूरत है और हो भी क्यों ना, जहाँ एक खुशमिजाज इंसान रहेगा वहां का मौसम भी उसके जैसा ही होगा. 
रात को खाना खाने के बाद, महफ़िल जम गयी, एक सिरे पे नीरज जी और दूजे पे मैं, दे दना दन शेर, ग़ज़लें निकल रहे थे समझ लीजिये की नशिस्त का miniaturisation था मगर जो भी था मजेदार रहा.
अगली सुबह तो क्रिकेट के साथ शुरू हुई, भूषन स्टील में एक बहुत अच्छी कोशिश है सब लोगों को एक मंच पे या एक  पिच पे लाने की, रोज़ सुबह सब लोग अपने पद, पदवी को मैदान के बाहर रख कर क्रिकेट खेलने जुटते हैं और नीरज जी अगुवा होते हैं. मैंने भी काफी दिनों से क्रिकेट नहीं खेला था और ये मुराद भी पूरी हो गयी.
ऊपर चित्र में नीरज जी bowling करते हुए 
मौसम भी साथ था इसलिए धडाधड दो मैच खेल लिए, नीरज जी ने इस मैच में batting भी करी, bowling भी करी, fielding भी करी और umpiring भी करी, ऐसे all -rounder से अगर नहीं मिले तो फिर क्या बात हुई (गुरु जी मुंबई जल्दी आ जाइये).
इस मजेदार खेल के बाद रविवार की शाम प्रकाश झा के नाम रही, मगर राजनीति ने बहुत राजनीति खेली हमारे साथ, टिकेट ही नहीं मिल पा रहा था मगर हार मानने वाले हम भी नहीं थे, आखिर में लेकर ही छोड़ा.
फिल्म देखने से पहले हम लोग इंतज़ार में बाहर बैठे थे तभी का ये चित्र और एक जिंदादिल हसीं, फेविकोल के मजबूत जोड़ सी चेहरे पे हर वक़्त की तरह खिल रही थी.
मुद्दतों से मुद्दई जिस मुलाक़ात को मैं सोच रहा था आख़िरकार वो मुकम्मल हुई.

04 June 2010

मानसून का advertisement

मुंबई में मानसून का प्रचार अभियान (हल्की फुल्की फुहारें) शुरू हो गया है, वैसे ये बताता चलूँ कि 'मानसून' से मतलब मानसून से ही है जग मुंधरा जी की फिल्म से नहीं है, ....................ये वो है जिसके बारे में मौसम विभाग कभी सही नहीं बता पाया इसलिए इस बार शायद उन्होंने कुछ ना कहने की सोची होगी तभी तो कोई सूचना या भविष्यवाणी सुनने को नहीं मिली. वैसे वो खामोश तो नहीं रहते और न होंगे उनकी आदत तो ऐसी नहीं थी ना है और ना होगी, हो सकता है मैंने ही उन की कही बातों पे गौर करना बंद कर दिया हो, जाने-अनजाने में.........चलो खैर जो भी हो.

एक अदद गर्मी के बाद, शायद रिकॉर्ड बना चुकी गर्मी, ऊपर से ये उमस उफ्फ्फ्फ़, (इसका ज़िक्र किये बिना गर्मी का नाम और काम अधूरा ही होगा)......शरीर से सब कुछ निचोड़ के चेहरे पे कुछ बूंदों की शक्ल में रख देती है, वैसे एक हल्की फुहार भी कुछ ऐसी ही बूंदे छोड़ देती है मगर दोनों में कितना अंतर है एक समानता होते हुए भी बिलकुल सुख-दुःख की तरह.

कल शाम जो बादल आसमान के आँचल में किसी फूल से सजे हुए थे, शाम ढलते-ढलते, रात में ना जाने क्या सोच के कुछ शरारत कर गए, लोगों के दिलों में कुछ उमीदें बरसा गए. मैंने भी बाहर जाके ख़ुद को भिगोना चाहा, कुछ बूंदों ने चेहरे को चूमा भी मगर शायद आवारा हवा को मेरी ये आवारगी अच्छी नहीं लगी और वो बादलों को उड़ा ले गयी. चलो जो कुछ ना से कुछ तो सही, छोटा-मोटा ही सही मानसून का premiere तो देख ही लिया..........वैसे केरल में तो फिल्म लग चुकी है, हफ्ते दो हफ्ते में अपने यहाँ भी लगने की उम्मीद है फिर भीगेंगे फुर्सत से.......

15 March 2010

मेरे कुछ आवारा साथी

कुछ ज्यादा ही ख़ामोशी हो गयी इन दिनों इस ब्लॉग से मगर आज ये ख़ामोशी मेरे कानों में जोर से चीख के गयी है. चलिए इस चुप्पी को तोडा जाये. बिना पोस्ट के दोस्तों कौन सा मुझे अच्छा लग रहा था मगर वक़्त था कि इजाज़त ही नहीं देता था मगर आज बहुत मिन्नतों से माना है. 

मुंबई की ज़िन्दगी में किसी भी चीज़ की कमी नहीं है और आप तकरीबन हर चीज़ खरीद भी सकते हो मगर कमबख्त वक़्त नहीं. इसी ज़िन्दगी का एक हिस्सा अब मैं भी बन गया हूँ वैसे तो ये एक बहाना ही है नहीं लिखने का लेकिन अगर सच का चश्मा पहन के देखता हूँ तो दिखता है कि लिखने के लिए कुछ ख्याल ही नहीं थे और जो ज़ेहन में आ भी रहे थे उनको लिख के कलम से गद्दारी करने की गवाही ये दिल मुझे नहीं देता था. सुबह घर से ऑफिस और शाम को ऑफिस से घर की भागमभाग नए ख्यालों को कोई शक्ल नहीं दे पा रही थी कुछ आता भी तो लोकल की भीड़ में आके खो सा जाता था. 

अब ज़िक्र लोकल का आ ही गया है तो कुछ उसके बारे में भी कहता चलूँ, मुंबई की लोकल (लोकल ट्रेन) का सफ़र जो पहली दफा करेगा वो तो तौबा तौबा करने लगेगा अरे सफ़र करना तो दूर की बात रही उसकी सिम्त देख भी ले तो चढ़ने से घबरा जायेगा और सोचेगा चलो यार बस से निकला जाये या फिर ऑटो की  सवारी कर लें. कुछ ऐसा ही शुरू में मेरे साथ भी हुआ था मगर अब तो उसका भी मज़ा आने लगा है, वो लपक के ट्रेन में चढ़ना और आपके पीछे की भीड़ अपना पूरा ज़ोर आपके ऊपर लगाके दो क़दमों को रखने लायक जगह बना देती है, अपने लिए भी, आपके लिए भी. जब सांस लेने का मन करे तो सर ऊपर उठा के वो भी ले लो लेकिन पहले तो इस रस्साकशी को देख के ही घबराहट हो जाती थी वो दरवाजे के बाहर निकली लोगों २ सतहें (अन्दर का मंज़र छोडिये), बस एक सिरा पकड़ लो और सवार हो जाओ बाकी सब कुछ गर्दी (भीड़ )कर देगी, अगर उतरना है तो गर्दी उतार भी देगी और अगर इस गर्दी का मन नहीं किया तो आप अपने स्टॉप से एक या दो स्टॉप आगे उतरोगे.

लगता है हर कोई भाग रहा है और भागे जा रहा है...........और आपको भी भागना पड़ेगा नहीं तो पीछे वाले आपको भगाते हुए अपने साथ ले चलेंगे, इतना ख्याल यहाँ सब लोग एक दुसरे का रखते हैं. इतनी भीड़ है मगर एक तन्हाई सी पसरी रहती है हर कोई इंतज़ार कर रहा होता है कि कब उसका स्टॉप आये और वो इस पिंजरे से छूट के अपनी दुनिया कि ओर उड़ चले. कोई अपने में गम है तो कोई रेडियो FM में बजते हुए गानों की धुनों में सर घुमा रहा है क्योंकि पैर को हिलाने की इजाज़त नहीं है, कोई भगवान् को याद कर रहा है (हनुमान चालीसा, बाइबिल, क़ुरान की आयतें आदि पढ़ रहा है), कोई अखबार के सहारे समाज से रूबरू हो रहा है, तो कोई ग़ज़ल सोच रहा है (मैं).........................
इसी उधेरबुन में, एक अशआर बना था जिससे अब आप सब भी रूबरू हो जाइये.

शाम सवेरे करता रहता दीवारों से पागल बातें.
मेरे कुछ आवारा साथी, तेरे ख़त औ' तेरी यादे.
जिसको देखो ख़ुद में गुम है कैसा शहर "सफ़र" ये तेरा
आदम तो लगते हैं लेकिन चलती फिरती जिंदा लाशें.

जल्द ही आता हूँ एक ग़ज़ल के साथ...................अरे सच कह रहा हूँ इस बार ये जल्दी एक महीने से पहले आ जाएगी.

30 August 2009

हमारा बचपन कुछ खास था...........

क्या आप बचपन के उन बेफिक्र और मस्ती भरे दिनों की कमी महसूस कर रहे हैं? मैं तो कर रहा हूँ...........
कभी कभी लगता है की सुविधाएँ हमें बहुत कुछ देकर बहुत कुछ छीन भी लेती है. जब मैं छोटा था तो तब घर में दूरदर्शन के अलावा कोई और चैनल नहीं आता था और अगर कहीं था भी तो हर किसी की पहुँच में नहीं था. मगर आज तो बाढ़ आ गई है हर साल, या कहूं हर हर महीने और हर हफ्ते कोई ना कोई नया चैनल आ जाता है. कुछ याद आया इसे देखकर, अरे ये दूरदर्शन का स्क्रीन सेवर था जो एक विशेष आवाज़ के साथ कभी आ जाता था और कहता था "रूकावट के लिए खेद है". जब हमारे पास मोबाइल फ़ोन नहीं था तब भी हम अपनों से जुड़े रहते थे, किसी को मिस कॉल देने की बजाय उसके घर के बाहर खड़े होकर जोर से उसका नाम चिलान्ना याद है आपको. तब हमारे पास प्ले स्टेशन, कंप्यूटर और आजकी वो हजारों चीजे नहीं थी मगर उस वक़्त हमारे साथ हमारे सच्चे दोस्त थे, जिनके साथ हम गली, मोहल्ले के खेल खेला करते थे और हमारे खेल कितने अजीब और दिलचस्प होते थे जैसे छुपन छुपाई, गिल्ली डंडा, कंचे और क्रिकेट तो होता ही था. अजीब इसलिए आजकल के बच्चे वो भूलते से जा रहे हैं, या फिर ये खेल काफी छोटे हो गए हैं उनके लिए. वापिस दूरदर्शन पे लौटता हूँ, चुनिन्दा कार्यक्रम और उनके लिए दीवानगी ही अलग होती है. शुक्रवार शाम ४ बजे "अलादीन और जिन्नी", रविवार की सुबह और "रंगोली", बुधवार और शुक्रवार की शाम का "चित्रहार", और चंद्रकांता, मालगुडी देस, सुरभि, भारत एक खोज, तहकीकात, देख भाई देख, व्योमकेश बक्षी, टर्निंग पॉइंट, अलिफ़ लैला, नीम का पेड़, हम लोग, बुनियाद, जंगल बुक और भी बहुत से यादगार लम्हें और विशेष रूप से "रामायण" और "महाभारत" जिन्होंने टी. वी. पे भी इतिहास रचा. मगर आज के वक़्त में हर किसी के पास विकल्प है और वो भी कई अनेक सुविधाओं के साथ. बातें तो कई हैं जो एक एक करके निकलती जाएँगी, अभी आपको छोड़ जा रहा हूँ एक खूबसूरत विडियो के साथ जिसे आपने पहले कई बार सुना होगा, फिर से अपनी यादों को ताजा कर लीजिये..........

04 August 2009

राजस्थान में गुज़रे कुछ हसीं पल......

राजस्थान जाने का अवसर मिलना मेरे लिए एक खास बात थी क्योंकि इससे पहले मैं कभी वहां गया नही था और काफी तमन्ना थी इसे करीब से देखने की जो पूरी हुई मैंने ऑफिस के काम के साथ-साथ घूमने का कोई मौका नही गवाया और काम से फुर्सत मिलते ही निकल पड़ता था उस जगह की प्रसिद्ध स्थानों को देखने राजस्थान में जयपुर, चित्तोर, उदयपुर, जोधपुर और अजमेर को देखने का सौभाग्य मिला
"दाल भाटी चूरमा" का स्वाद भूल नही सकता, "मिर्च बड़ा" और "मावे की कचोरी" के क्या कहने (लिखते हुए भी मुंह में पानी आ रहा है)। जाने से पहले नीरज जी से कुश जी का नम्बर लिया, पहचान गए ना........कुश की कलम वाले, और वहां मैंने उन्हें बिना देरी किए कॉल लगा दी, मगर मैं तो उन्हें जानता था पर वो मुझे नही। एक अनजान शख्स से कॉल और मुलाक़ात की बात उन्हें कुछ अजीब सी लगी मगर नीरज जी के नाम ने मेरी एक पहचान करा दी और मुलाक़ात का वक्त क्रिस्टल पाम में मुक़र्रर हुआ।
कुश जी ने जयपुर के एक और ब्लॉगर सय्यद जी को भी बुला लिया सोने पे सुहागा। सय्यद जी लविज़ा नाम से अपना ब्लॉग लिखते हैं जो उनकी नन्ही परी(बिटिया) का नाम है और उसकी शरारतों को अपने लफ्ज़ देते हैं। दोनों का साथ मेरे लिए कुछ अनमोल था और वो गुज़रे लम्हें एक हसीं याद बन गए। बातों ही बातों में कई बातें निकली और वक्त कब छू हो गया पता ही नही चला।
कुछ घूमी जगह के चित्र छोड़ जा रहा हूँ आपके लिए...................

(ये है चित्तोर किले में वो जगह जहाँ पे रानी पद्मावती ने जोहर किया था)


(ये है कृष्ण दीवानी मीरा जी का मन्दिर)

(ये है शीश महल चित्तोर दुर्ग में)

(मुझे तो पहचान ही गए होंगे)

अब जल्द ही उत्तर प्रदेश जाना है, देखिये किस-किस से मुलाक़ात होती है।


25 June 2009

दास्ताँ-ए-बारिश और चंद शेर

मुंबई में बारिश ने दस्तक दे दी है और मेरे घर पे कुछ खास अंदाज़ में दी है। अपने नए मेहमान का इस्तकबाल कुछ खास तरीके से किया जिसे वो शायद भुला ना पाए। हर शनिवार और रविवार को ऑफिस में काम करना मना है सीधे कहूं तो छुट्टी है। मैं इसी मौके का फायदा उठा कर अपने दोस्तों से मिलने निकल जाता हूँ, और वापसी होती है रविवार की रात को। दोस्तों के साथ रिमझिम बरस रही बारिश की बूंदों का लुत्फ़ उठाया तो बचपन की पुरानी यादें ताज़ा हो गई, याद आ गए वो दिन जब भीगने के बहाने ढूँढा करते थे और घर में भीगने में डांठ इंतज़ार करती थी. इसी मौज़ूँ पे लिखा हुआ एक शेर याद आ रहा है.........
"माँ की डांठ नही भूले,
जब बारिश में भीगे थे."
मलाड से वापसी पे मौसम बहुत सुहाना था, हवा ने ताज़गी की चादर ओढ़ ली थी और वो एक खूबसूरत एहसास दे रही थी। अपने ठिकाने की ओर बढता हुआ जब कमरे की सिम्त जा रही सीढियों पे चढ़ रहा था तो उनपे लिपटी हुई मिटटी और गुज़रे हुए लोगों के क़दमों के निशाँ गवाही दे रहे थे की आज बारिश ने लोगों को एक सुकून भरी साँस दी है, रोज़ की चिलचिलाती धूप से।
शायद बारिश ने मेरी ब्लॉग पे की गई पिछली पोस्ट पढ़ी होगी "घर में कोई मेहमां आने वाला है...." और सोचा होगा चलो इसके घर पे दस्तक दे ही दूँ, बेचारा किसी को पुकार रहा है। घर का दरवाजा खोला तो पहली नज़र में कुछ नज़र नही आया क्योंकि कमरे में बिखरा अँधेरा मुझे देखने की इजाज़त नही दे रहा था मगर जैसे ही रौशनी ने उसके इरादे रोके और आंखों को खुल के देखने की रास्ता दिया तो एक अलग ही मंज़र था उन बेबस नज़रों के सामने.............
........कमरे में आया हुआ पानी मुस्कुरा के कह रहा था कैसे हो, दो दिन मज़े में काट के आ गए अब और मज़े लो, वैसे ज़्यादा कुछ सामान तो अभी जोड़ा नही मगर जितना भी था वो मेरी ज़रूरत के हिसाब से बहुत था मगर पानी अपनी बाहों में भर के उन सब का बोसा ले रहा था और उसके शिकार हुई मेरी डायरी, मेरे सोने का गद्दा और कुछ बदनसीब कागज़। बस अब एक ही काम रह गया था पानी को बा-इज्ज़त उसका सही रास्ता दिखने का। वो रात तो लिखी थी फर्श के नाम और सोने का अब वो ही ठिकाना था..............मगर उसका भी एक अलग मज़ा था जो ज़िन्दगी भर एक याद बन के जिंदा रहेगा और आगे सम्हल के रहने की हिदायत देगा मुंबई की बारिश से।

इस पोस्ट को इसके अंजाम तक पहुँचने से पहले, दो आज़ाद शेरों को आपके हवाले कर रहा हूँ................

"बोलने के झूठ सब आदी हुए यारों,
बिन बनावट सच कहाँ बेबाक आए है
फ़ोन ने, -मेल ने लम्हें हसीं छीने,
प्यार का वो ख़त कहाँ अब डाक आए है।"
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03 June 2009

पढ़ाई ख़त्म, पहली नौकरी और भी बहुत कुछ पहला ...........

सबको मेरा सलाम,
जल्द आने का वादा किया था मगर देर हो गई मगर उस देर की कुछ वजह है। पहले जैसे दिन अब नही रह गए हैं, जब तक पुणे में पढ़ाई कर रहा था तब तक २४*७ नेट का साथ रहता था मगर जैसे ही पढ़ाई पूरी हुई और नौकरी लगी तो फ़िर सुख के वोदिन भी गए। मई १५, २००९ को वाशी, नवी मुंबई में National Co-operative Agriculture & Rural Development Banks' Federation Ltd. "केंद्रीय सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक महासंघ" में कार्यभार सम्हाला। कुछ दिनों तक तो अतिथि भवन में मजे किए मगर जल्द ही अपना ख़ुद का ठिकाना ढूँढने के लिए भाग दौड़ शुरू कर दी, कुछ मुश्किलों के बाद कामोठे में किराये का एक फ्लैट मिल गया। महीना ख़त्म होते होते पहली तनख्वाह भी मिल गई, जिसे पाकर एक अलग ही आनंद की अनुभूति हुई (जिसे लफ्जों में बयां करना मेरे बस की बात नही).
अरे ..............एक बहुत ज़रूरी बात तो बताना ही भूल गया, गुरु जी से नीरज जी का मोबाइल नम्बर लिया और उनसे बात हुई और मज़ा आ गया, जल्द ही उनसे मिलने भी जाऊंगा।
पिछले तरही मुशायेरे में हिस्सा नही ले पाया मगर इस बार पूरी तैयारी है।
एक नई ग़ज़ल के साथ जल्द ही आपका स्नेह पाने के लिए आऊंगा........................
......................फिर मिलेंगे जल्द ही।

26 March 2009

अलविदा ओ VAMNICOM.................... ३१ मार्च २००९

आप सभी को मेरा नमस्कार,
आज कहने को बहुत कुछ है मगर ये तय नही कर पा रहा हूँ, कैसे कहूं और क्या-क्या कहूं।

मैं पंतनगर उत्तराखंड से दो साल पहले "गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय" से कृषि स्नातक करके VAMNICOM, पुणे MBA करने आया और अब जाने का दिन आ गया है। इन दो सालों में बहुत कुछ पाया है मैंने। इस ब्लॉग की शुरुआत हुई (२८ जनवरी, २००८) को और फ़िर तो आप सब का प्यार मिलता रहा।

लिखता मैं पंतनगर से ही था मगर ग़ज़ल की बारीकियां नही मालूम थी, उन बारीकियों को मुझे सिखाने के लिए उस इश्वर ने मेरा परिचय एक फ़रिश्ते (गुरु जी, पंकज सुबीर जी) से करवाया।

असल में इस मिलन का अपरोक्ष रूप से शुक्रिया जाता है समीर लाल जी को, अब पूछेंगे वो कैसे?
वो ऐसे की, मैंने ब्लॉग पे अपनी बिन बहर की गज़लें लिखनी शुरू कर दी थी ब्लॉग्गिंग के जूनून में, एक दिन समीर लाल जी अपनी उड़न तश्तरी से मेरे ब्लॉग पे उतरे और एक टिपण्णी छोड़ के चले गए, अपने ब्लॉग पे पहली टिपण्णी पाकर उस व्यक्ति के बारे में जानने की इच्छा हुई और उनके ब्लॉग को पढ़ डाला। उसमे समीर जी ने ग़ज़ल की क्लास्सेस का ज़िक्र किया था और पता था पंकज सुबीर(गुरु जी)। बस आव देखा न ताव पूरे ब्लॉग को १ दिन में पूरा पढ़ डाला उसमे लगी टिप्पणियों समेट।
इन दो सालों में काफी लोगों से जान पहचान हुई इस ब्लॉग के ज़रिये. और मेरे आधे-अधूरे ज्ञान को गुरु का साथ मिला. इन दो सालों के बारे में एक नज़्म लिखी है जो कॉलेज और हॉस्टल की मस्ती से लबालब जीवन के बारे में है. ये नज़्म मैं अपने दोस्तों को समर्पित करता हूँ...........


सोचा ना था इतनी जल्दी वक्त जाएगा गुज़र।

लम्हों में बदल जाएगा दो साल का ये एक सफ़र।

जब कभी मैं सोचता हूँ दिन वो कॉलेज के हसी,

MBA का excitement और पुणे की मस्ती,

आया था मैं दूर घर से लेके कुछ सपने यहाँ,

अजनबी जो लगते थे बन गए अपने यहाँ,

फ़िर हुआ क्लास्सेस का चक्कर बातें वही घिसी पिटी,

मगर थी स्लीपिंग अपनी हॉबी सोने में सब वो कटी,

कुछ थे अपने check-points, रेड्डी सर और डी रवि,

हॉस्टल की timing, मुंडे जी और भोला जी,

याद आता है मनोहर, याद आती है टपरी,

maggi, चाय, सिगरेट अपनी सुपरमार्केट वही,

FC का भी चार्म था, इवेनिंग की outings,

छोटी-छोटी बातों पे कभी करी थी fightings,

खूब बने pairs यहाँ, lovers पॉइंट PMC,

पर अपना अड्डा tiger हिल, दारु, रम, बियर, व्हिस्की,

साल मजे में बीत गया और आया फ़िर summer,

ऐश के दो और महीने काट दिए रह के घर,

वापसी जब आए कॉलेज, नए मुर्गे जूनियर,

रात दिन लिए sessions लिए नाम पे इंट्रो के हमने,

रॉब के कुछ और महीने धीरे-धीरे लगे थे काटने ,

प्लेसमेंट लेके हुई पार्टी दारु रम की,

वैसे तो ये होती रहती मगर अलग थी बात इसकी,

.

आ गया अब जाने का दिन, अलविदा ओ VAMNICOM.

जाने कब फ़िर आना होगा, अलविदा ओ VAMNICOM.
___________________________________
PMC:- पिया मिलन चौराहा
FC:- Fergusson College

03 January 2009

मेरी गलती..........

आप सभी को मेरा नमस्कार,
कुछ लोगों को ये रचना बहुत पसंद, मैं इसे ग़ज़ल कहने की गलती कर रहा था मगर मेरे कभी किए हुए अच्छे कर्मो का ही ये फल होगा की मैं अपनी गलती को पहचान पाया तो सिर्फ़ और सिर्फ़ गुरु जी के कारन। कायदे से मुझे इसे यहाँ से तुंरत हटा लेना चाहिए मगर मैं चाह रहा हूँ की ये मुझे मेरी गलतियों का एहसास कराये और मुझे आगे अच्छा करने की प्रेरणा दे।
जिस दिन ये ग़ज़ल मैंने पोस्ट करी सौभाग्य से उसी दिन गुरु जी ने मुझे, उनसे बात करने को कहा और उनसे बात करके बहुत कुछ सीखने को मिला।
गलतियाँ:-
१] इस रचना का पहला ही मिसरा किसी और की रचना से मेल खा रहा है।
२] कुछ शेरो में मिसरा-ऐ-उला, मिसरा-ऐ-सानी को अच्छी तरह से नही जोड़ रहा है।
३] मैंने इसमे रदीफ़ "मत पूछो" लिया है जिसे मैं सही तरह से निभा नही पाया सिर्फ़ खानापूर्ति की कोशिश की है।
४] इस रचना का तीसरा शेर का एक मिसरा "दीदार तेरा दिल की कोई धड़कन हो" वजन के हिसाब से तो सही है मगर कहने में अटक रहा है।
५] मैं गुरु जी का आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, की उन्होंने मुझे मेरी गलतियों से अवगत कराया और साथ ही साथ एक दिशा भी दी। मैंने अपनी गलती को सुधारने की कोशिश अपनी अगली रचना में की है जो इस को सुधारने के कारन ही बन पाई है.

28 November 2008

अमनों-सुकू का होगा इम्तेहान कब तलक?

"इस अमनों-सुकू का होगा इम्तेहान कब तलक?
ये जेहाद लेगा मासूमों की जान कब तलक?"

बहुत से सवाल अब भी अपने जवाब की तलाश में हैं?
क्या हम कुछ सीख पाएंगे या फ़िर सब भूल कर अगले सबक (बम विस्फोट) का इंतज़ार करेंगे और हर बार की तरह शहीदों के बलिदान को टीका टिप्पणियों तक सिमटा देंगे?

28 January 2008

मेरा पहला कलाम, आप सभी को सलाम.

दोस्तों, आप सभी को अंकित "सफ़र" का सलाम।
ये मेरी एक कोशिश है जिसके तहत मैं अपनी गजलों, शेरों, कविताओं और नज्मों से आपको रूबरू करवाउंगा। मैं शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ मोहन "मुन्तजिर" का जिनकी शागिर्दी में मैंने काफी कुछ सीखा और उन्होंने मुझे छोटी छोटी बारीकियों से बवास्ता करवाया। मैं शुक्रगुजार हूँ अपने शायर दोस्तों मुस्तफा "माहिर" और अरुण "मासूम" का जिनके साथ मैंने अपनी शायरी को निखारा और उन्होंने कदम कदम पे मेरा साथ दिया।

मगर एक बात जो की कहना बहुत ज़रूरी है वो बात है उस जगह की जहाँ मेरा जन्म हुआ है, जिसकी मिटटी में मैं खेला हूँ,पला हूँ बड़ा हुआ हूँ और सिर्फ़ मेरे लिए ही नहीं ये बात मेरे दोस्तों के लिए भी सच है उस पंतनगर की सरज़मी ने हम लोगों को बहुत कुछ दिया है और हम उसे कभी भूल नहीं सकते।


वैसे कहने को तो बहुत बातें हैं और वो मैं कहूँगा भी और लिखूंगा भी, बस आपको भी थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा क्योंकि अब आपके और मेरी शायरी की बीच जो दूरियां थी वो दूर हो गई हैं।

चंद मिसरे आप सभी के लिए .............................

आप सब जो हैं मिरे, सलाम लिख रहा हूँ।
राज़ दिल के आज मैं तमाम लिख रहा हूँ।

दिल मिरा है इंतज़ार में किसी हसीं के,
मुद्दतों से मुद्दई, वो शाम लिख रहा हूँ।