01 December 2016

ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है


आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है

मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है

तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है

इस लम्हे का हुस्न यही है
के ये इसके बाद नहीं है

उसने आह भरी तो जाना
दर्द मेरा बेदाद नहीं है

नींद खुली तो ढह जायेंगे
ख़्वाबों की बुनियाद नहीं है

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फोटो - साभार Korekgraphy

11 May 2016

ग़ज़ल - रंग सब घुलने हैं आख़िर इक कलर में


ख़ौफ़ शामों का सताता है सहर में
कुछ अँधेरे घर बना बैठे हैं घर में

उम्र पर चढ़ती सफ़ेदी कह रही है
रंग सब घुलने हैं आख़िर इक कलर में

धूप कुछ ज़्यादा छिड़क बैठा है सूरज
छाँव सब कुम्हला गई हैं दोपहर में

ज़िन्दगी यादों की दुल्हन बन गई है
बूँद अमृत की मिला दी है ज़हर में

बारिशों का ज़ोर था माना मियाँ पर
बल नदी जैसे दिखे हैं इस नहर में

दर्द को आवाज़ देती कुछ सदायें
गूँजती हैं रोज़ गिरजे के गजर में

ख़ूबियों को इक तरफ़ रख कर के सोचो
ऐब भी आयें अगर कोई हुनर में

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फोटो - साभार इंटरनेट 

27 April 2016

ग़ज़ल - उसकी आँखों ने फिर ठगा है मुझे


उसकी आँखों ने फिर ठगा है मुझे
हिज्र इस बार भी मिला है मुझे

नींद बैठी है कब से पलकों पर
और इक ख़्वाब देखता है मुझे

जिस्म नीला पड़ा है शब से मेरा
साँप यादों का डस गया है मुझे

ज़िन्दगी की तवील राहों पर
उम्र ने रास्ता किया है मुझे

एक उम्मीद के बसेरे में
शाम होते ही लौटना है मुझे

रात भर नींद हिचकियाँ ले है
ख़्वाब ये किसका सोचता है मुझे

प्यारे दीवानगी बचाये रख
दश्त ने देख कर कहा है मुझे

तेरी चारागरी को हो मालूम
बस तेरा लम्स ही दवा है मुझे

ख़्वाब इक झिलमिलाया आँखों में
क्या तेरी नींद ने चखा है मुझे

इक सदा हूँ तेरी तरफ बढ़ती
अपने अंजाम का पता है मुझे

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फोटो - साभार इंटरनेट