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27 April 2016

ग़ज़ल - उसकी आँखों ने फिर ठगा है मुझे


उसकी आँखों ने फिर ठगा है मुझे
हिज्र इस बार भी मिला है मुझे

नींद बैठी है कब से पलकों पर
और इक ख़्वाब देखता है मुझे

जिस्म नीला पड़ा है शब से मेरा
साँप यादों का डस गया है मुझे

ज़िन्दगी की तवील राहों पर
उम्र ने रास्ता किया है मुझे

एक उम्मीद के बसेरे में
शाम होते ही लौटना है मुझे

रात भर नींद हिचकियाँ ले है
ख़्वाब ये किसका सोचता है मुझे

प्यारे दीवानगी बचाये रख
दश्त ने देख कर कहा है मुझे

तेरी चारागरी को हो मालूम
बस तेरा लम्स ही दवा है मुझे

ख़्वाब इक झिलमिलाया आँखों में
क्या तेरी नींद ने चखा है मुझे

इक सदा हूँ तेरी तरफ बढ़ती
अपने अंजाम का पता है मुझे

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फोटो - साभार इंटरनेट

25 January 2016

ग़ज़ल - लौटती हर सदा बताती है


लौटती हर सदा बताती है
आसमां तक पुकार जाती है

एक तस्वीर पर्स में मेरे
देखता हूँ तो मुस्कुराती है

क्यूँ ये दिल मुँह फुलाये बैठा है?
एक धड़कन इसे बुलाती है

प्यार की एक दुखती रग दिल को
हाँ, बहुत ज़ोर से दुखाती है

मुझ पे ठहरी निगाह इक तेरी
कोई मंतर सा बुदबुदाती है

हम हक़ीक़त से मिल नहीं पाते
उम्र ख़्वाबों में बीत जाती है

साथ अपनों के जब भी होता हूँ
ज़िन्दगी क्यूँ मुझे डराती है

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Pebble Art by Sharon Nowlan

22 August 2012

ग़ज़ल - दोस्त से बढ़ के देखिये मुझको

एक ग़ज़ल कहने की कोशिश की है, कुछ शेर बुन लिए है मगर लगता है अभी इस रदीफ़ और काफिये पर कुछ शेर और भी बुने जा सकते हैं। जब तक मैं उन आने वाले शेरों की खैर-मक़दम में लगता हूँ तब तक आप इन शेरों को पढ़िए। आप, अपनी पसंद या नापसंद से वाकिफ़ ज़रूर करवाइयेगा। अरुज़ियों से माफ़ी क्योंकि मतले में ईता का दोष बन रहा है।

दोस्त से बढ़ के देखिये मुझको
आप यूँ भी तो सोचिये मुझको

उसकी आदत ग़ज़ल के मिसरे सी
कह रहा है निभाइये मुझको

मैं उसे मिल भी जाऊं मुमकिन है
वो मुहब्बत से गर जिये मुझको

तेरी यादों में एक कोना भर
सिर्फ इतना ही चाहिए मुझको

कट गई है पतंग शोहरत की
आप भी आके लूटिये मुझको

तोहमतों और नसीहतों के साथ
कुछ दुआएं भी दीजिये मुझको

बस हटा कर मेरे तख़ल्लुस को
शेर मेरा सुनाइये मुझको

16 November 2011

ग़ज़ल - काढ देंगे सहर उजालों की

पिछले महीने दीपावली में सुबीर संवाद सेवा पे आयोजित तरही मुशायरे के लिए ये ग़ज़ल कही थी। कुछ नए शेर जुड़े हैं और कुछ पुराने शेरों में थोड़ी सी और छेड़खानी कर के, आखिरकार ये ग़ज़ल आप से गुफ़्तगू करने के लिए यहाँ है।


(एक खूबसूरत सुबह गुप्त-काशी, उत्तराखंड की)

क़र्ज़ रातों का तार के हर सू
एक सूरज नया उगे हर सू

काढ देंगे सहर उजालों की
बाँध कर रात के सिरे हर सू

तेरे हाथों का लम्स पाते ही
एक सिहरन जगे, जगे हर सू

रात टूटी हज़ार लम्हों में
ख़ाब सारे बिखेर के हर सू

मेरे स्वेटर की इस बुनावट में
प्यार के धागे हैं लगे हर सू

चाँद को गौर से जो देखा तो
जुगनुओं के लिबास थे हर सू

खेल दुनिया रचे है रिश्तों के
जिंदगानी के वास्ते हर सू

चोट खाया हुआ मुसाफिर हूँ
साथ चलते हैं मशविरे हर सू

ख़त्म आखिर सवाल होंगे क्या?
मौत के इक जवाब से हर सू

24 January 2011

ग़ज़ल - सोचिये, सोचना ज़रूरी है

जब मैंने ये खबर पढ़ी या कुछ ऐसी ही ख़बरें जिनमे बस स्थान में परिवर्तन रहा होगा, पढता हूँ तो लगता है कि वाकई हमने सोचना और सोच के काम करना बंद कर दिया है। हम सभी आँखें मूँद कर झुण्ड के झुण्ड में चले जा रहे हैं कदम से कदम मिलकर ना जाने किस ओर, इसका भी शायद ही किसी को पता हो ?

जब हमें कुछ सही करने का दायित्व मिलता है तो हम उससे नज़र चुरा कर, वक़्त की कमी का बहाना बना कर आगे निकल जाते हैं, और अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं और ऐसा चल रहा था, चल रहा है और शायद आगे भी चलता रहेगा...........क्योंकि वक़्त बदल जायेगा मगर हम नहीं।

(चित्र:- आभार निखिल कुंवर)

सोचिये, सोचना ज़रूरी है
आग को भी हवा ज़रूरी है

सोचिये है ख़ुदा ज़रूरी क्यूँ ?
छोड़िये…गर ख़ुदा ज़रूरी है

रूठ कर जाते शख़्स की जानिब
कम से कम इक सदा ज़रूरी है

आ मेरी नींद के मुसाफ़िर आ 
ख़ाब की इब्तिदा ज़रूरी है

ज़िन्दगी जीने का सबब माँगे
मैंने पूछा…कि क्या ज़रूरी है

दो जुदा रास्ते बुलाते हैं
और इक फैसला ज़रूरी है

अपने हालात क्या कहे दुनिया
बस ये जानो… दुआ ज़रूरी है

अजनबी शहर में मुसाफिर से
रास्तों की वफ़ा ज़रूरी है

जिस्म दो एक हों मगर पहले
रूह का राब्ता ज़रूरी है

२१२२-१२१२-२२/११२
बहरे खफीफ मुसद्दस मख्बून मक्तुअ अस्तर