सलाम दोस्तों,
चीज़ मुहब्बत है जादू की इक चाबी।
लहजा बदला, बातें भी बदली बदली।
उनसे मिलना सालों बाद करे पागल,
खत को खोल टटोल रहा बातें पिछली।
हाथ पकड़ जिसको सिखलाया था चलना,
काश वही बनता बूढे की बेसाखी।
बात चुनावों की है तो वे जागे हैं,
नेता क्या हैं जैसे मेढंक बरसाती।
घर की सूखी रोटी अच्छी बाहर से,
बात समझ में आई है अब अम्मा की।
ख्वाब सलोने छोड़ अभी, कोशिश तो कर,
मंजिल को पा जाता है बहता पानी।
घर में कोई मेहमा आने वाला है,
छत पे बैठा कौवा बोल रहा ये ही।
ग़ज़ल का आखिरी शेर "घर में कोई मेहमा आने वाला है, छत पे बैठा कौवा बोल रहा ये ही।" जो मैंने लिखा है का ख्याल ऐसे आया की हमारे वहां (उत्तराखंड) ये मान्यता है अगर छत की मुंडेर पे बैठ के कौवा अगर बोले तो वो कोई मेहमान के आने का सन्देश होता है.