22 August 2012

ग़ज़ल - दोस्त से बढ़ के देखिये मुझको

एक ग़ज़ल कहने की कोशिश की है, कुछ शेर बुन लिए है मगर लगता है अभी इस रदीफ़ और काफिये पर कुछ शेर और भी बुने जा सकते हैं। जब तक मैं उन आने वाले शेरों की खैर-मक़दम में लगता हूँ तब तक आप इन शेरों को पढ़िए। आप, अपनी पसंद या नापसंद से वाकिफ़ ज़रूर करवाइयेगा। अरुज़ियों से माफ़ी क्योंकि मतले में ईता का दोष बन रहा है।

दोस्त से बढ़ के देखिये मुझको
आप यूँ भी तो सोचिये मुझको

उसकी आदत ग़ज़ल के मिसरे सी
कह रहा है निभाइये मुझको

मैं उसे मिल भी जाऊं मुमकिन है
वो मुहब्बत से गर जिये मुझको

तेरी यादों में एक कोना भर
सिर्फ इतना ही चाहिए मुझको

कट गई है पतंग शोहरत की
आप भी आके लूटिये मुझको

तोहमतों और नसीहतों के साथ
कुछ दुआएं भी दीजिये मुझको

बस हटा कर मेरे तख़ल्लुस को
शेर मेरा सुनाइये मुझको
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