31 December 2013

After thoughts - Lunchbox (Part - 2)

इस गुज़रते साल में सिनेमा ने अपने सौ साल पूरे किये। सौ साल के इस नटखट बच्चे ने इस साल पाँव उचका कर कई चीज़ें छूने की कोशिश की और छूने में कामयाब भी रहा। इन्हीं सब सिनेमाई कामयाबी में रितेश बत्रा की "लंचबॉक्स" भी आई। मुम्बई में जाती हुई लोकल को पकड़ने का रोमांच वो भी भागते हुए  …. रोमांच के साथ-साथ रोमांस भी लिये होता है। रितेश बत्रा की ''लंचबॉक्स'' के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। मुझे फिल्म थिएटर में देखनी तो थी मगर वक़्त नहीं मिल पा रहा था। और १ अक्टूबर २०१३ को लगा बस ये शायद आखिरी मौका हो क्योंकि bookmyshow पर २ अक्टूबर २०१३ की फ़िल्मी खिड़कियाँ "बेशरम" हो चुकी थी, और शर्म से उभर भी न पाई फिर। ख़ैर छोड़िये  ...........

कोई माने न माने लेकिन हर शहर अभिशप्त होता है एकाकीपन के लिये, और उस में रह रहे लोग उस श्राप को मिटाने की कोशिशों में समय के साथ-साथ ख़ुद भी श्रापित हो जाते हैं। ये फ़िल्म इसी श्राप को प्राप्त मुम्बई के अनजान चेहरों और ज़िंदगियों में से कुछ-एक की ज़िन्दगी को टटोलने की कोशिश करती है। मेरे ख़याल से किसी भी फ़िल्म को महान उसके कलाकार नहीं, उसके सह-कलाकार बनाते हैं (मुख्य कलाकार तो बनाते ही हैं यार) और इस फ़िल्म में वो काम 'देशपांडे आंटी' और 'शेख़' ने किया है। बिलकुल वैसे ही जैसे आलू-गोभी की सब्जी का स्वाद आलू-गोभी नहीं, उस में पड़े मसाले और उप्पर से छिड़की गई धनिये की पत्तियाँ बढ़ाती हैं। अब बात शेख़ की, नवाज़ुद्दीन अपने क़िरदार में पानी की तरह उतरते हैं और अपनी उपस्थिति से स्वादिष्ट दाल में तड़का लगाने का काम करते हैं।

इला के क़िरदार में निमृत ऐसी घुली हैं कि जहाँ पर इला निमृत हो गई हैं और निमृत इला। इला की दिनचर्या एक आम घरेलू औऱत के जीवन का एक ऐसा हिस्सा है जिसमें सारी चीज़ें सलीके से एक टिन के डब्बे रखकर हरे-नीले से दिखने वाले बैग में डालकर डब्बेवाले को पकड़ा दी जाती हैं ताकि वो शहर के दूसरे हिस्से में किसी अपने की भूख मिटा सके। दरअसल हर गृहणी अपने पति को खाने के साथ-साथ अपनी ज़िन्दगी का एक हिस्सा भेजती है, एक निश्छल प्यार जो कभी पनीर की शक्ल में होता है तो कभी कोफ्ते की। भूरे रंग की ग्रेवी के उप्पर धनिये के पत्तों का छिड़काव निर्मल एहसास का छिड़काव होता है। मगर जीवन का सच तो ये है कि हम सब ज़िन्दगी में बड़ी सी दिखने वाली चीज़ों की तरफ़ भागते हैं, चाहे वो सैलरी हो, चाहे खुशियाँ हो या फिर ज़िन्दगी। एक बड़े लम्हें के इंतज़ार में कितने छोटे लम्हें कुर्बान हो जाते हैं हमें कभी अंदाज़ा ही नहीं होता।

फ़िल्म के एक दृश्य में जब इला,  देशपांडे आंटी के बताये हुए मैजिक ट्रिक को प्रयोग में ला कर डब्बे के लौटने के बेसब्र इंतजार में होती है और दरवाजे पर डब्बेवाले की आहट पाते ही लपक कर डब्बा उठाती है। उसे खोलकर देखने पर उमंग से भरी वह देशपांडे आंटी को बताती कि आंटी आज डब्बा चाट-पोंछकर खाया गया है। और जवाब में आंटी भी चहककर जवाब देती हैं कि “मैंने कहा था न, ये नुस्खा काम करेगा।” पति के आने पर उससे सुनने की कुछ आस लगायी हुई इला जब खुद निराश हो, लंच के बारे में पूछती है तो मशीन सा रटा-रटाया हुआ जवाब पाती है। बेपरवाह पति डब्बे में ‘आलू-गोभी’ होने की बात कह वहां से चला जाता है और इला उसे ये बता भी नहीं पाती कि उसका बनाया लंचबॉक्स उसे मिला ही नहीं है। उसकी बेरुख़ी को उसके उस वक़्त डोरी में टंगे कपड़े उतारने से बहुत अच्छे से समझा जा सकता है। जैसे वो तार से कपड़े नहीं सपने उतार रही हो। वो सपने जो सुबह-सुबह गीले-गीले एहसासों से उम्मीदों के तार पे डाले गए थे कि इन्हें जब पहना जायेगा तो इनके रंग कितने खिले हुए होंगे मगर वही सपने एक तेज़ धूप अपने रंग खो चुके हैं।

एक अच्छी फिल्म और एक अच्छे डायरेक्टर की ये ख़ासियत होती है कि वह आपके तयशुदा माइंडसेट को पकड़ लेते हैं और फिर उसे एक माइल्ड शॉक देते हैं और आप वहीं पर बंध जाते हैं। फ़िल्म में कई खूबसूरत दृश्य हैं उनमें से इरफ़ान के हिस्से आया हुआ वो जिसमें एक बार उन्हें इला के पत्र में आखिरी लिखी हुई पंक्ति मिलती है ‘तो किसलिए जिए कोई’ और अगली सुबह ऑफिस आते वक़्त ऑटोवाले से पता चलता है कि एक ऊँची इमारत से एक औरत अपनी बच्चे सहित कूद गई है। और इसी तरह सिगरेट छोड़ने की कोशिश करते हुए भी, जब अपनी बालकनी से दूसरी तरफ़ की खिड़की में से अंदर चहकती हुई चंद ज़िंदगियाँ देखते हैं ख़ासकर वो छोटी सी लड़की। वो छोटी सी दुश्मनी, साजन फर्नांडेस और बच्चों के बीच  ...... और महज़ व्यवहार में आये बदलाव से सुलह होना, कुछ हसीन पल दे जाती है। या फ़िर सड़क पर शेख़ के साथ वो स्केच आर्टिस्ट वाला दृश्य।

हम ज़िन्दगी में उन्हीं चीज़ों में खुशियाँ ढूंढने की कोशिश करते हैं जो हमें मिली हैं, लेकिन इन तथाकथित दायरों से बाहर निकलकर हमें अपनी पहचान और सुकून मिलता है जिसका बाइप्रोडक्ट खुशियाँ होती हैं। ऐसी पहचान ऐसा सुकून जिनका टिकट हमें वाया भूटान लेना पड़ता है। दरअसल हम सब अपने खोये हुए हिस्से तलाश रहे हैं।
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