08 December 2008

ग़ज़ल - चाँद खिलौना तकते थे

चाँद खिलौना तकते थे।
जब यारों हम बच्चे थे।

रिश्तों में इक बंदिश है,
हम आवारा अच्छे थे।

डांठ नही माँ की भूले,
जब बारिश में भीगे थे।

कुछ नए शेर जोड़ रहा हूँ....................................

पास अभी भी हैं मेरे,
तुने ख़त जो लिक्खे थे।

ठोकर खा के जाना है,
बात बड़े सच कहते थे।

यार झलक को हम तेरी,
गलियों-गलियों फिरते थे।

उसने ही ठुकराया है,
हम उम्मीद में जिनसे थे।
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