02 May 2009

ग़ज़ल - शब के बोझ से कभी सहर थकी नहीं

आप सभी को मेरा नमस्कार,
काफी दिनों बाद ब्लॉग पे आना हुआ है, पहले माफ़ी मांगना चाहूँगा................
पुणे से जाने के बाद सीधे घर का रुख किया था और घर जाके वक्त का पता ही नही चला, इसी बीच में दिल्ली आना भी हुआ, फ़िर लगा की काफ़ी दिनों तक मस्ती कर ली.........
एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ, मुझे मेरी गलतियों से अवगत कराएँ।

शब के बोझ से कभी सहर थकी नहीं।
ज़िन्दगी बढे चली मगर थकी नहीं।

रेत की ज़मीं पे, नीर की तलाश में,
बाजुएं थकी नहीं, कमर थकी नहीं।

कर फतह हज़ार पे, नयी को ढूँढने,
चल पड़ी तलाश में, नज़र थकी नहीं।

आग बन गयी वो बात जो ज़रा सी थी,
खौफ भर गयी मगर खबर थकी नहीं।

जानकार के है किनारा आखिरी में ही,
जूझती ही वो रही, लहर थकी नहीं।


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