30 September 2013

नज़्म - आसमान से शहद बनायें

अगर कोई आपको अपनी गिरफ़्त में ताउम्र रखना चाहता है तो उसे आपको किसी डोर से बाँधने की ज़रुरत नहीं है, वो तो बस आपको मुक्त कर देगा, आप ख़ुदबख़ुद खिंचे चले आयेंगे गिरफ़्तार होने के लिये। दरअसल नोस्टाल्जिया, अफ़ीम से भी बड़ा नशा होता है, एक बार आप फँसे तो फिर खुदा बचाये। यक़ीन मानिये हम इस नशे के आदी हो चुके हैं, और वक़्त की परवाह किये बगैर इसकी एक डोज़ को यादों की फड़फड़ाती नसों में उतारने के लिये बेचैन फिरते रहते हैं। अपने घर, शहर, लोगों के बीच बस एक लम्हा भर बिताने को आतुर रहते हैं।

अगस्त की बरसात में डूबी पंतनगर की एक हसीन शाम निखिल ने बड़े पुरअसर तरीके से मन के अन्दर गहरे तक फ्रीज़ कर दी है, ऐसे कि मानो वो कैमरा नहीं कोई पेंटिंग ब्रश पकड़े हुए हो।


निखिल की हर तस्वीर कलम की अंगड़ाई को तोड़कर लफ़्ज़ों को जगा देती है. उसी कशिश में गिरफ़्तार होकर कुछ लफ्ज़ कलम से बह निकले। उस मंज़र को वो कितना उकेर पाये ये तो पता नहीं ................

फूलों के आबाद नगर से चुनती हैं रस के धागे 

कैद घरों में हौले-हौले बुनती हैं रस के धागे 
बरसाती मौसम के साथ आई हैं कुछ पाबंदी
फूलों से रस चुनने की पहले सी नहीं आज़ादी 
तिस पर देखो आसमान ने फूलों से रंग चुरा लिये
पहले ही था रंग-बिरंगा और रंग क्यूँ चढ़ा लिये 
रंग छोड़ के नीला आसमान अब, 
थोड़ा काला
थोड़ा पीला

रंगीला-सा दिखता है 


आओ इसको सबक सिखायें, 
आसमान से शहद बनायें।
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