25 March 2015

ग़ज़ल - ये इक सिगरेट नहीं बुझती कभी से

न जाने कितने ही लम्हें ऐसे होते हैं जो राख हो कर भी अपनी आँच सम्हाले रखते हैं ताकि कारवान-ए-ज़िन्दगी को सर्द वक़्त में गर्माहट दे सकें, और ज़िन्दगी खुशरंग बनी रहे। 


कहूँ क्या शोख़ कमसिन सी नदी से
तेरे अंदाज़ मिलते हैं किसी से

हमारे होंठ कुछ हैरान से हैं
तुम्हारे होंठ की इस पेशगी से

तुम्हें मिल जायेगा क्या ऐ निगाहों
हमारे दिल की पल-पल मुखबिरी से

हुई हैं राख कितनीं रात फिर भी
ये इक सिगरेट नहीं बुझती कभी से

झरोका बात का जल्दी से खोलो
ये रिश्ता मर न जाये ख़ामुशी से

नये रिश्ते की क्या कुछ शक़्ल होगी
अगर आगे बढ़े हम दोस्ती से

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