13 March 2009

ग़ज़ल - देख ले मेरी नज़र से तू मेरे महबूब को

आप सभी को मेरा नमस्कार......................
सर्वप्रथम गुरु जी (पंकज सुबीर जी) को ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए शुभकामनायें।
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एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ, काफिया ज़रा मुश्किल था.................

असलूब :- स्टाइल
मक्तूब:- ख़त
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देख ले मेरी नज़र से तू मेरे महबूब को।
अलहदा उसकी अदा, अलहदा असलूब को।
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हमसे पूछो कैसे काटी करवटों में रात वो,
ले लिया था हाथ में इक आप के मक्तूब को।
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छेड देता है ग़ज़ल बस आपका इक ख्याल ही,
कह रहे दीवानगी है, लोग इस असलूब को.
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है नही तस्वीर कोई पास मेरे आप की,
कर दिया है फ्रेम मैंने आपके मक्तूब को।
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ख्वाब देखू आपके दिन रात तो लगता है यू,
रख दिया हो मोतियों पे ओस भीगी दूब को।
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मखमली एहसास सा होता है मेरी रूह को,
जब "सफ़र" छिप के नज़र है देखती महबूब को।
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