30 March 2010

ग़ज़ल - गुनाहों को अपने छिपायें कहाँ तक

गुनाहों को अपने छिपायें कहाँ तक.
बहुत दूर जाके भी जायें कहाँ तक.

गलत राह पर उसका गिरना तो तय था 
भला साथ देती दुआयें कहाँ तक.

अहम् को बचाने की जद्दोज़हद में 
वो झूठी कहानी सुनायें कहाँ तक.

हमें खौफ़ गलती का बांधे हुए है 
मगर सच से नज़रे चुरायें कहाँ तक.

न मकसद कोई ज़िन्दगी का तिरे बिन 
ये साँसों से रिश्ता निभायें कहाँ तक.

मिरे मन मुसाफिर को यादों के रस्ते 
भटकने से आखिर बचायें कहाँ तक.

बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम (१२२-१२२-१२२-१२२) पर ये ग़ज़ल कही गयी है, इसके बहुत से उदाहरण आपको गौतम भैय्या (मेजर गौतम राजरिशी जी) के ब्लॉग पे मिलेंगे.

अपने विचारों से इसका स्वागत करें...............
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