24 November 2008

ग़ज़ल - रात लपेट के सोया हूँ मैं

आँखे जब भी बोलें जादू
बातें शोख, अदा इक खुशबू

तेरी आँखों का ये जादू 
काबू में है दिल बेकाबू 

रात लपेट के सोया हूँ मैं 
चाँद को रख कर अपने बाज़ू 

एक ख़याल तुम्हारा पागल 
लफ़्ज़ों से खेले हू-तू-तू 

जब लम्हों की जेब टटोली 
तुम ही निकले बन कर आँसू 

याद तुम्हारी फूल हो जैसे 
सारा आलम ख़ुश्बू-ख़ुश्बू

बीच हमारे अब भी वो ही 
तू-तू-मैं-मैं, मैं-मैं-तू-तू 

दुनिया को क्यूँ कोसे ज़ालिम 
जैसी दुनिया वैसा है तू

नींद के पार उभर आया है 
ख़्वाब सरीखा कोई टापू 


[हिंदी चेतना जनवरी-मार्च 2013 अंक में प्रकाशित]


20 November 2008

ग़ज़ल - सबका अपना अपना कहना

सबका अपना, अपना कहना।
कहते रहना, कहते रहना।
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ये कश्ती ही जाने है बस,
किस जानिब है उसको बहना।
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बात पता ये मुझको ना थी,
बिन तेरे है मुश्किल रहना।
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दिल में जो हैं दर्द पुराने,
वो चाहे बस दिल में रहना।
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सोच यही माँ बेचे जेवर,
मेरे बच्चे मेरा गहना।
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झूठ बड़ा होने से पहले,
लाजिम है फ़िर सच को कहना।
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बाबा ने एक बात सिखाई,
बेटा आगे बढ़ते रहना।

15 November 2008

मेरा पहला कदम................................."दो आँसू"

बात २००१-२००२ की है, जब मैं १२वी में था। मेरे स्कूल में १५ अगस्त,२००१ को एक कवि सम्मलेन का आयोजन हुआ था और उसमे विद्यार्थियों को भी पड़ने के लिए आमंत्रित किया गया था मगर शर्त थी अगर वो अपना कुछ लिखते हो। मुझे उस दिन एहसास हुआ की काश अगर मेरी भी कुछ कवितायेँ होती तो शायद मैं भी उन लोगो के साथ मंच पे होता। लिखने की रूचि मेरी पहले से थी लेकिन पहले मैं निबंध लिखता था और कई प्रतियोगिताएं भी जीता था। मगर कविता लिखना एक अलग विधा थी। मगर उस दिन की घटना का मुझे काफ़ी अफ़सोस हो रहा था और मैं उस कवि-सम्मलेन को सुनने के लिए भी नही गया। शायद यही मैंने अच्छा काम किया, अब आप सोच रहे होंगे ऐसा मैं क्यों कह रहा हूँ। दरअसल मेरे अन्दर एक रचना(कविता) आकर ले रही थी और शाम को जिस वक्त स्कूल में कवि-सम्मलेन हो रहा था, उसी वक्त मैंने अपने जीवन की पहली कविता लिखी।
उस कविता का शीर्षक था ............ "दो आँसू"
और वो कविता ये है..............

जीवन है एक दिया हम उसकी बाती हैं।
समर्पण है लौ उसकी, बाती को जो जलाती है।
क्षितिज को आज तक कौन छू पाया है।
ढूँढ़ते है इश्वर को वो तो दिल में समाया है।
हर पल है चलना हमको और चलते जाना है।
इन सिमटी हुई राहों पे ही उम्मीदों का महल बनाना है।
काफी नही है इतना और भी कुछ करना है।
आज जन्म हुआ है तो कल सभी को मरना है।
तमन्ना नही की दुनिया में मेरा नाम हो सके।
आरजू है बस इतनी मेरे जाने के बाद,
मुझ पर कोई "दो आंसू" रो सके।
उसके बाद ये सिलसिला चल पड़ा मगर उसमे भी बहुत सी कहानियाँ है, की कब मैंने कविताओं का दामन छोड़ के ग़ज़ल का आँचल थाम लिया। वो आगे कभी...............