03 March 2009

ग़ज़ल - खिलखिला कर कैसे हँसतें हैं भला

आप सबको मेरा नमस्कार................
काफी दिनों के बाद एक ग़ज़ल लगा रहा हूँ, कुछ व्यस्तताओं में घिरा हुआ था मगर अब कोई शिकायत का मौका नही दूंगा।
बहरे रमल मुसद्दस महजूफ (२१२२-२१२२-२१२)

अब के जब सावन घुमड़ कर आएगा।
दिल पे बदली याद की बरसाएगा।
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मन से अँधियारा मिटेगा जब, तभी
अर्थ दीवाली का सच हो पायेगा।
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दूसरे की गलतियाँ तो देख ली,
ख़ुद को आइना तू कब दिखलायेगा।
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अपने बारे में किसी से पूछ मत,
कोई तुझको सच नही बतलायेगा।
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धुन में अपनी चल पड़ा पागल सा है,
दर बदर अब मन मुझे भटकायेगा।
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गर्दिशों में छोड़ देंगे सब तुम्हे,
प्यार माँ का संग चलता जाएगा।
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वोट जब मन्दिर के मुद्दे पर मिलें,
कौन मुदा भूख का भुनवायेगा।
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खिलखिला कर कैसे हँसतें हैं भला,
अब तो बच्चा ही कोई सिखलाएगा।
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ये जो हैं आतंकवादी जानवर,
कौन मानवता इन्हे सिखलाएगा।
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तीन रंगों पर लगेगा दाग एक,
भूख से बच्चा जो चूहे खायेगा।
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हम भी सुन कर के चले आए "सफ़र",
आज वो गज़लें हमारी गायेगा.
(गुरु जी के आशीवाद से कृत ग़ज़ल)

14 February 2009

ग़ज़ल - "मुहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं"

आप सभी को नमस्कार, 

एक महीने बाद कुछ लिखने बैठ रहा हूँ ब्लॉग पे, क्षमा चाहता हूँ. मगर व्यस्तता ही कुछ ऐसी थी और है भी की समय ही नही मिल पा रहा था. गुरु जी भी नाराज़ थे की मैंने कोई पोस्ट नही लगाई, इसी एक महीने में काफी अच्छा अनुभव मिला, जिनमे से एक था अपने आप में अनूठे ऑनलाइन कवि सम्मलेन-मुशायेरे में काव्य पाठ करना और तरही मुशायेरे में मेरे शेर का हासिल-ऐ-मुशायरा शेर बन जाना.

उसी ग़ज़ल से आपको रूबरू करवाता हूँ, जब गुरु जी ने ये मिसरा दिया था "मुहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं" तो मैं तो कोई मोहब्बत भरी ही ग़ज़ल लिख देता. मगर एक बार गुरु जी से फ़ोन पे बात हुई थी तो गुरु जी ने कहा था की "अंकित, समाज में जो घटित हो रहा है उसे लिखने की कोशिश करो, वही बात दिमाग में थी, इसलिए ख्याल भी उसी दिशा में आए और शेर भी वही सोच के लिखे.

खुशी में साथ हँसते हैं, ग़मों में साथ रोते हैं.
मुहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं.


नशे में चूर गाड़ी ने किया यमराज से सौदा,
नही मालूम दौलत को सड़क पे लोग सोते हैं.


कभी हर्षद, कभी केतन, कभी सत्यम करे धोखा,
मगर इन चंद के कारन सभी विश्वास खोते हैं.


महज़ वो कौम को बदनाम करते हैं ज़माने में,
जो बस जेहाद के जरिये ज़हर के बीज बोते हैं.


ये सारा खेल कुर्सी का समझ में आएगा सब के,
ये नेता झूठ हँसते हैं, ये नेता झूठ रोते हैं.


हमारे शहर घर पे बढ़ गए आतंक के हमले,
ये गुस्सा भी दिलाते हैं, ये पलकें भी भिगोते हैं.

आखिरी में आप सभी का शुक्रिया जिनका प्यार और आशीर्वाद मुझे मिलता रहा है और आशा करता हूँ की आगे भी मिलता रहेगा. जल्द ही एक नई ग़ज़ल के साथ हाज़िर होता हूँ..................

10 January 2009

ग़ज़ल - .....मैं क्या कहूं

मैंने अपनी पिछली रचना में भारी गलती की थी, एक मायने में अगर वो गलती नही करता तो इतनी जल्दी गुरु जी से बात करने का सौभाग्य नही मिल पाता। उसी की हुई गलती को सुधारने की कोशिश करने की मैंने कोशिश की मगर वो हो ना सका और एक नई ग़ज़ल बनी। मगर इस ग़ज़ल का एक शेर उस पुरानी ग़ज़ल का ही ख़याल है। इस ग़ज़ल को सही रूप में लाना गुरु जी के बिना सम्भव नही था.
बहर २२१२-२२१२-२२१२
मुस्‍तफएलुन मुस्‍तफएलुन मुस्‍तफएलुन


मिल के नज़र झुक जाए जब मैं क्या कहूं.
मुश्किल बड़े हालात अब मैं क्या कहूं.

मेरी नज़र पढ़ ना सकी तू दिलरुबा,
खामोश रहने का सबब मैं क्या कहूं.

सागर मुहब्बत का कहीं कम ना पड़े,
दिल है मेरा सहरा तलब मैं क्या कहूं.

तुम हमसफ़र बन के चलो उस मोड़ तक,
इक याद बन जाए गज़ब मैं क्या कहूं.

इस इश्क ने जादू न जाने क्या किया,
कटती नज़र में रात अब मैं क्या कहूं।
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[गुरु जी (पंकज सुबीर जी) को समर्पित, जिनके बिना इसका बनना सम्भव नही था]