29 October 2010

ग़ज़ल - अश्कों से सींची ये क्यारी लगती है

आज जिस ग़ज़ल को आप सभी से रूबरू करवा रहा हूँ, उसे कुछ रोज़ पहले बेलापुर में हुए, एक कवि सम्मलेन-मुशायरे में पढ़ा था. नीरज जी का शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने बेलापुर में हुए इस कार्यक्रम के बारे में बताया और मुझे पढने का अवसर भी दिलवाया. उस कवि सम्मलेन-मुशायेरे में अज़ीम शायर, जाफ़र रज़ा साहब से भी मुलाक़ात हुई और उनके नायाब शेरों को सुनने का सौभाग्य भी मुझे मिला, मगर वक़्त का खेल देखिये, अभी कुछ दिन पूर्व ही वो शेरों-शायरी का खूबसूरत नगीना हम सभी से दूर उस ऊपर वाले की पनाह में चला गया है. मेरी ये ग़ज़ल, जाफ़र रज़ा साहब को समर्पित है.

(चित्र:- बन्दर-कूदनी, भेराघाट, जबलपुर)

अश्कों से सींची ये क्यारी लगती है
आँखों में ही रात गुजारी लगती है

दिल की बातों को उन तक पहुंचाने में
आँखों की थोड़ी फनकारी लगती है

चाँद-सितारों का आँचल शब ओढ़े पर
दुनिया को फिर भी अंधियारी लगती है

बोझ किताबों का लादेनन्ही सी जाँ 
उम्मीदों की इक अलमारी लगती है

भूखे पेट से पूछो तुम सूखी रोटी
कितनी मीठी, कितनी प्यारी लगती है

नाज़ुक रिश्ते आग पकड़ते हैं जल्दी
बातों-बातों में चिंगारी लगती है

24 September 2010

ग़ज़ल - मैंने सोचा उसे, सोचता रह गया.

ऐसा लग रहा है कि एक मुद्दत हो गयी, कुछ कहें, कुछ लिखे इस ब्लॉग पर.......... कुछ धुंधला सा नज़र आता है कि इस ब्लॉग पे पिछली पोस्ट तकरीबन २ महीने पहले लगी थी, और तब से कुछ नहीं. वजह फिर वही पुरानी, घिसी-पिटी, उसी वक़्त की सख्ती, उसी वक़्त को बारहा कोसना।

इसी दरम्यान ऑफिस के काम के सिलसिले में 'श्री लंका' भी जाना हुआ, घूमना फिरना तो ज्यादा हुआ नहीं इसलिए यात्रा वृतांत क्या लिखूँ ......... जितना भी श्री लंका को देखा, समझा और जाना, उससे बहुत खूबसूरत देश लगा, वहां के लोग बहुत अच्छे लगे. 

एक छोटा देश, जिसकी आबादी मात्र  २ करोड़ है, ये मात्र इसलिए क्योंकि तकरीबन इतनी आबादी तो मुंबई में ही होगी।  बाहर घूमने के लिए जब कोलम्बो में मॉल, सड़कों और गलियों की सैर की तो शुरू में लगा कि आज शायद शहर बंद होगा, मगर फिर पता लगा ये तो आम है, किसी आम दिन की तरह ...... अब मुंबई की भीड़ देखने के बाद अगर कहीं किसी और जगह जब कुछ कम लोग दिखते हैं तो आँखों को कुछ खटकता सा लगता है.

आप सब के लिए उन गुज़री यादों को सहेजे हुए एक फोटो छोड़ जा रहा हूँ जो मोबाइल फ़ोन से गाले नामक जगह में एक पर्वत से खींची गयी है। ये वो पर्वत है जिसे लोकात्तियों एवं पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी द्वारा हिमालय से लाया गया था, जिसे संजीवनी पर्वत के नाम से विख्याति मिली। कहते है कि आज भी यहाँ इस पर्वत पे संजीवनी और उसके अलावा भी कई अमूल्य और अचूक जड़ी-बूटियाँ उपलब्ध हैं।


इन बातों से आगे बढ़ते हुए एक ग़ज़ल आप सब के लिए वैसे तो ये ग़ज़ल थोड़ी पुरानी है, सीहोर में हुई नशिस्त में सुनाई थी तब से वीनस पीछे पढ़ा हुआ था कि ब्लॉग पे फिर से लगा दो।

बहरे मुतदारिक मुसमन सालिम (२१२-२१२-२१२-२१२)

रात भर ख़त तेरा यूँ खुला रह गया।
जैसे कमरे में जलता दिया रह गया।

भूख दौलत की बढती रही दिन-ब-दिन,
आदमी पीछे ही भागता रह गया।

छीन के ले गई मुझ से दुनिया ये सब,
बस तेरी याद का आसरा रह गया।

ख़्वाब की ज़िन्दगी क्या है किसको पता?
एक पूरा हुआ, दूसरा रह गया।

पास आ तो गए पर न वो बात है,
कुरबतें तो बढ़ी, फासला रह गया।

क्या बताऊँ "सफ़र", उसके बारे में अब,
मैंने सोचा उसे, सोचता रह गया।

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तो ये थी जनाब मेरी ग़ज़ल और जाते जाते आप सब के लिए छोड़ जा रहा हूँ जगजीत सिंह साहब की रेशमी आवाज़ में इस "फूल खिला दे .............." ग़ज़ल को। जिसे उन्होंने काफी वक़्त बाद किसी फिल्म में गाया है, शकील आज़मी साहब की लिखी हुई ये ग़ज़ल रूप कुमार राठोड के संगीत में लयबद्ध है. फिल्म का नाम है "लाइफ एक्सप्रेस". तब तक आप भी अपने आप को भिगोइए इस ग़ज़ल में।


आप इस ग़ज़ल को यहाँ से डाउनलोड भी कर सकते हैं - http://www.divshare.com/download/12639002-7e3

15 July 2010

ग़ज़ल - मेघों की साहूकारी में सिर्फ बहाने मिलते हैं

तक़रीबन एक महिना होने को आ गया है और ब्लॉग ख़ामोशी ओढ़ के बैठा हुआ था मगर कर भी क्या सकते हैं, थोड़ी व्यस्तता ही रही या कहूं पूरी व्यस्तता रही और वक़्त ही नहीं मिल पा रहा था. इस बेबसी के आलम में लगता था कि ब्लॉग कहीं बेकग्राउंड  में "दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन.........." गाना बजा रहा है और बुला रहा है। 
(चित्र:- सागर, मध्य प्रदेश)

चलिए इस वक़्त की कंजूसी को बाय-बाय कहते हुए हाज़िर हूँ एक ताज़ा ग़ज़ल के साथ, गुरुदेव पंकज सुबीर जी द्वारा इस्लाह की गयी ये ग़ज़ल अब आपके रूबरू है। 

ख़्वाबों में माज़ी के कुछ धुंधलें अफ़साने मिलते हैं
छाँव तले पीपल की बैठे लोग सयाने मिलते हैं

प्यासी धरती माँग रही कब से थोड़ी बारिश लेकिन
मेघों की साहूकारी में सिर्फ़ बहाने मिलते हैं

दूर नदी परबत की बाहों में उमड़े तो लगता है
दुनिया की नज़रों से छिपकर दो दीवाने मिलते हैं

अंगड़ाई जब भी लेते बीते लम्हें बेचैनी में
फूल तुम्हारी यादों के मुझको सिरहाने मिलते हैं

बड़े बुजुर्गों की बातें लगती हैं पीर फ़क़ीरों सी,
उनकी संगत में बैठो तो छिपे ख़ज़ाने मिलते हैं

वक़्त बदल देता है चेहरे और इन्सां की नीयत भी 
कसमों-वादों की गलियों में अब वीराने मिलते हैं 

[त्रैमासिक 'नई ग़ज़ल' के जुलाई-सितम्बर 2011 अंक में प्रकाशित]