11 April 2012

ग़ज़ल - जिस्म से बूंदों में रिसती गर्मियों की ये दुपहरी

ऐसा लग रहा है जैसे सूरज टुकड़े-टुकड़े होकर ज़मीन पर गिर रहा है। वैसे तो ये हर साल का किस्सा है, मगर इस दफे तो थोडा वक़्त से पहले ही आग़ाज़ हो चुका है। आहिस्ता आहिस्ता बढ़ती तपिश, नमी के साथ मिलके साजिशें रचना शुरू कर चुकी है। अब तो बरसात का इंतज़ार है। 

 फोटो - निखिल कुंवर
गर्मियों की दुपहरी के कुछ रंग अपने अंदाज़ से पिरोने की कोशिश की है, पढ़िए और बताइए वो कोशिश कितनी कामयाब हो पाई  है। 

जिस्म से बूंदों में रिसती गर्मियों की ये दुपहरी
तेज़ लू की है सहेली गर्मियों की ये दुपहरी

शाम होते होते सूरज की तपिश कुछ कम हुई पर
चाँद के माथे पे झलकी गर्मियों की ये दुपहरी

भूख से लड़ते बदन हैं, सब्र खोती धूप में कुछ
हौसले है आज़माती गर्मियों की ये दुपहरी

बर्फ के गोले लिए ठेले से जब आवाज़ आये
दौड़ नंगे पाँव जाती गर्मियों की ये दुपहरी

उम्र की सीढ़ी चढ़ी जब, छूटते पीछे गए सब
क्यूँ लगे कुछ अजनबी सी गर्मियों की ये दुपहरी

छाँव से जब हर किसी की दोस्ती बढ़ने लगी तो
और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की ये दुपहरी

आसमां अब हुक्म दे बस, बारिशें दहलीज़ पर हैं
लग रही मेहमान जैसी गर्मियों की ये दुपहरी

13 February 2012

ग़ज़ल - इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में

हम अपनी जड़ों से कितना भी दूर चले जाएँ, लेकिन हमारी जड़ें हमसे अलग नहीं होती. वो हरदम हमारे साथ रहती हैं, चाहे वो यादों में रहें या हमारे रहन-सहन या बोल-चाल में रहें. ये नए-नए उगते शहर भी कभी गाँव की शक्ल में रहे होंगे, फिर कस्बे बने होंगे, और अब शहर का रुतबा लेकर इठला रहे हैं. धीरे-धीरे सब बदल रहा है, विकास अपने दायरें बढ़ा रहा है, हर कोई उससे कदम-ताल करके उसके साथ चल रहा है या चलने की कोशिश तो कर ही रहा है.

हम में से कई या कहूं अधिकतर अपने गाँव/कस्बे/शहर से दूर इस विकास से जुड़े हैं या जुड़ रहे हैं, मगर हमारे साथ अपनी एक अलग ही मिठास लिए हमारा एक सुनहरा बीता हुआ कल भी हम से जुड़ा हुआ है .

गाँव (सौनी, रानीखेत, उत्तराखंड) का पुराना मकान वैसे तो अब नया मकान बन गया है 
मगर पुराना अभी भी यादों के सहारे अपनी जगह मजबूती से कायम है.

चलिए इन बातों के गुच्छों से निकल कर कुछ इन्ही हालातों से मिलती-जुलती, इनकी याद दिलाती एक ग़ज़ल कहता हूँ. ये ग़ज़ल गुरुदेव 'पंकज सुबीर जी' के ब्लॉग पे चल रहे तरही मुशायरे में दिए गए एक मिसरे पे कही गई है, इसका आखिरी शेर सीहोर, मध्य प्रदेश के सुकवि रमेश हठीला जी को समर्पित है.

घर की मुखिया बूढी लाठी है अभी तक गाँव में
तज्रिबों की क़द्र बाकी है अभी तक गाँव में

सरपरस्ती में बुजुर्गों की सलाहें हैं छिपी
राय, मुद्दों पर सयानी है अभी तक गाँव में

खेत की उथली सी पगडण्डी को थामे चल रही
बैलगाड़ी की सवारी है अभी तक गाँव में

दिन ढले चौपाल पर यारों की नुक्कड़, बैठ कर
रात के परदे गिराती है अभी तक गाँव में

क्या मुहब्बत भी किसी फरमान की मोहताज है?
फैसले ये 'खाप' देती है अभी तक गाँव में

शहर में कब तक जियेगा यूँ दिहाड़ी ज़िन्दगी
लौट जा घर, दाल-रोटी है अभी तक गाँव में

फूल की खुश्बू ने लांघे दायरे हैं गाँव के
पर बगीचे का वो माली है अभी तक गाँव में

मेरे बचपन की कई यादों के दस्तावेज़ सा
इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में

आ चलें फिर गाँव को, रिश्तों का लेने ज़ायका
एक चूल्हा, एक थाली है अभी तक गाँव में

सुकवि रमेश हठीला जी को समर्पित शेर,
ज़िन्दगी की शाख पे फिर फूल बन कर लौट आ
तेरे जाने की उदासी है अभी तक गाँव में

*******

02 January 2012

ग़ज़ल - नए साल में, नए गुल खिलें, नई खुशबुएँ, नए रंग हों

आप सब को नव वर्ष की शुभकामनायें। 
नये साल की शुरुआत, एक ग़ज़ल से करना बेहतर है। बीते साल का लेखा-जोखा बंद करके, नये साल में कुछ करने की कसमें खाई जाएँ जिनका हिसाब-किताब २०१२ के अंत में किया जायेगा। नया साल अपने साथ एक नया जोश लाता है, एक नयी उमंग जगाता है। इस उम्मीद के साथ कि अपने से किये गए वादों को पूरी शिद्दत से पूरा किया जायेगा, तो हाज़िर करता हूँ एक ग़ज़ल जो बहरे कामिल मुसमन सालिम पे है। जिसका रुक्न ११२१२-११२१२-११२१२-११२१२ है।
.


हैं कदम-कदम पे जो इम्तिहां मेरे हौसलों से वो दंग हों
चढ़े डोर जब ये उम्मीद की, मेरी कोशिशें भी पतंग हों

ये जो आड़ी-तिरछी लकीरें हैं मेरे हाथ में, तेरे हाथ में
किसी ख़ाब की कई सूरतें, किसी ख़ाब के कई रंग हों

कई मुश्किलों में भी ज़िन्दगी तेरे ज़िक्र से है महक रही
तेरी चाहतों की ये खुशबुएँ मैं जहाँ रहूँ मेरे संग हों

कई हसरतों, कई ख्वाहिशों की निबाह के लिए उम्र भर
इसी ज़िन्दगी से ही दोस्ती, इसी ज़िन्दगी से ही जंग हों

जो रिवाज़ और रवायतें यूँ रखे हुए हैं सम्हाल के
वो लिबास वक़्त की उम्र संग बदन कसें, कहीं तंग हों

तेरा बाग़ है ये जो बागवां इसे अपने प्यार से सींच यूँ
नए साल में, नए गुल खिलें, नई खुशबुएँ, नए रंग हों

ये किसी फक़ीर की है दुआ तुझे इस मकाम पे लाई जो
तू जहाँ कहीं भी रहे 'सफ़र' तेरी हिम्मतें तेरे संग हों