27 April 2016

ग़ज़ल - उसकी आँखों ने फिर ठगा है मुझे


उसकी आँखों ने फिर ठगा है मुझे
हिज्र इस बार भी मिला है मुझे

नींद बैठी है कब से पलकों पर
और इक ख़्वाब देखता है मुझे

जिस्म नीला पड़ा है शब से मेरा
साँप यादों का डस गया है मुझे

ज़िन्दगी की तवील राहों पर
उम्र ने रास्ता किया है मुझे

एक उम्मीद के बसेरे में
शाम होते ही लौटना है मुझे

रात भर नींद हिचकियाँ ले है
ख़्वाब ये किसका सोचता है मुझे

प्यारे दीवानगी बचाये रख
दश्त ने देख कर कहा है मुझे

तेरी चारागरी को हो मालूम
बस तेरा लम्स ही दवा है मुझे

ख़्वाब इक झिलमिलाया आँखों में
क्या तेरी नींद ने चखा है मुझे

इक सदा हूँ तेरी तरफ बढ़ती
अपने अंजाम का पता है मुझे

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फोटो - साभार इंटरनेट

25 January 2016

ग़ज़ल - लौटती हर सदा बताती है


लौटती हर सदा बताती है
आसमां तक पुकार जाती है

एक तस्वीर पर्स में मेरे
देखता हूँ तो मुस्कुराती है

क्यूँ ये दिल मुँह फुलाये बैठा है?
एक धड़कन इसे बुलाती है

प्यार की एक दुखती रग दिल को
हाँ, बहुत ज़ोर से दुखाती है

मुझ पे ठहरी निगाह इक तेरी
कोई मंतर सा बुदबुदाती है

हम हक़ीक़त से मिल नहीं पाते
उम्र ख़्वाबों में बीत जाती है

साथ अपनों के जब भी होता हूँ
ज़िन्दगी क्यूँ मुझे डराती है

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Pebble Art by Sharon Nowlan

30 November 2015

ग़ज़ल - हर इक साँचे में ढल जाये ज़रा ऐसे पिघल प्यारे


हर इक साँचे में ढल जाये ज़रा ऐसे पिघल प्यारे
तू अपनी सोच के पिंजरे से बाहर तो निकल प्यारे 

झुकायेगा नहीं अब पेड़ अपनी शाख पहले सा 
तेरी चाहत अगर ज़िद्दी है तो तू ही उछल प्यारे 

पस-ए-हालात में ख़ामोशियाँ भी चीख उट्ठी हैं 
रगों में गर लहू बहता है तेरे तो उबल प्यारे 

जहाँ फ़रियाद गुम होने लगे आवाज़ में अपनी 
वहाँ पर टूटने ही चाहिये सारे महल प्यारे 

निवाला आज भी मुश्किल से मिलता है यहाँ लेकिन 
फले-फूले हैं हाथी, साइकिल, पंजा, कमल प्यारे 

है अहल-ए-शहर का लहजा न जाने तल्ख़ क्यूँ इतना 
सुनाना चाहता हूँ मैं यहाँ बस इक ग़ज़ल प्यारे