02 May 2009

ग़ज़ल - शब के बोझ से कभी सहर थकी नहीं

आप सभी को मेरा नमस्कार,
काफी दिनों बाद ब्लॉग पे आना हुआ है, पहले माफ़ी मांगना चाहूँगा................
पुणे से जाने के बाद सीधे घर का रुख किया था और घर जाके वक्त का पता ही नही चला, इसी बीच में दिल्ली आना भी हुआ, फ़िर लगा की काफ़ी दिनों तक मस्ती कर ली.........
एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ, मुझे मेरी गलतियों से अवगत कराएँ।

शब के बोझ से कभी सहर थकी नहीं।
ज़िन्दगी बढे चली मगर थकी नहीं।

रेत की ज़मीं पे, नीर की तलाश में,
बाजुएं थकी नहीं, कमर थकी नहीं।

कर फतह हज़ार पे, नयी को ढूँढने,
चल पड़ी तलाश में, नज़र थकी नहीं।

आग बन गयी वो बात जो ज़रा सी थी,
खौफ भर गयी मगर खबर थकी नहीं।

जानकार के है किनारा आखिरी में ही,
जूझती ही वो रही, लहर थकी नहीं।


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26 March 2009

अलविदा ओ VAMNICOM.................... ३१ मार्च २००९

आप सभी को मेरा नमस्कार,
आज कहने को बहुत कुछ है मगर ये तय नही कर पा रहा हूँ, कैसे कहूं और क्या-क्या कहूं।

मैं पंतनगर उत्तराखंड से दो साल पहले "गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय" से कृषि स्नातक करके VAMNICOM, पुणे MBA करने आया और अब जाने का दिन आ गया है। इन दो सालों में बहुत कुछ पाया है मैंने। इस ब्लॉग की शुरुआत हुई (२८ जनवरी, २००८) को और फ़िर तो आप सब का प्यार मिलता रहा।

लिखता मैं पंतनगर से ही था मगर ग़ज़ल की बारीकियां नही मालूम थी, उन बारीकियों को मुझे सिखाने के लिए उस इश्वर ने मेरा परिचय एक फ़रिश्ते (गुरु जी, पंकज सुबीर जी) से करवाया।

असल में इस मिलन का अपरोक्ष रूप से शुक्रिया जाता है समीर लाल जी को, अब पूछेंगे वो कैसे?
वो ऐसे की, मैंने ब्लॉग पे अपनी बिन बहर की गज़लें लिखनी शुरू कर दी थी ब्लॉग्गिंग के जूनून में, एक दिन समीर लाल जी अपनी उड़न तश्तरी से मेरे ब्लॉग पे उतरे और एक टिपण्णी छोड़ के चले गए, अपने ब्लॉग पे पहली टिपण्णी पाकर उस व्यक्ति के बारे में जानने की इच्छा हुई और उनके ब्लॉग को पढ़ डाला। उसमे समीर जी ने ग़ज़ल की क्लास्सेस का ज़िक्र किया था और पता था पंकज सुबीर(गुरु जी)। बस आव देखा न ताव पूरे ब्लॉग को १ दिन में पूरा पढ़ डाला उसमे लगी टिप्पणियों समेट।
इन दो सालों में काफी लोगों से जान पहचान हुई इस ब्लॉग के ज़रिये. और मेरे आधे-अधूरे ज्ञान को गुरु का साथ मिला. इन दो सालों के बारे में एक नज़्म लिखी है जो कॉलेज और हॉस्टल की मस्ती से लबालब जीवन के बारे में है. ये नज़्म मैं अपने दोस्तों को समर्पित करता हूँ...........


सोचा ना था इतनी जल्दी वक्त जाएगा गुज़र।

लम्हों में बदल जाएगा दो साल का ये एक सफ़र।

जब कभी मैं सोचता हूँ दिन वो कॉलेज के हसी,

MBA का excitement और पुणे की मस्ती,

आया था मैं दूर घर से लेके कुछ सपने यहाँ,

अजनबी जो लगते थे बन गए अपने यहाँ,

फ़िर हुआ क्लास्सेस का चक्कर बातें वही घिसी पिटी,

मगर थी स्लीपिंग अपनी हॉबी सोने में सब वो कटी,

कुछ थे अपने check-points, रेड्डी सर और डी रवि,

हॉस्टल की timing, मुंडे जी और भोला जी,

याद आता है मनोहर, याद आती है टपरी,

maggi, चाय, सिगरेट अपनी सुपरमार्केट वही,

FC का भी चार्म था, इवेनिंग की outings,

छोटी-छोटी बातों पे कभी करी थी fightings,

खूब बने pairs यहाँ, lovers पॉइंट PMC,

पर अपना अड्डा tiger हिल, दारु, रम, बियर, व्हिस्की,

साल मजे में बीत गया और आया फ़िर summer,

ऐश के दो और महीने काट दिए रह के घर,

वापसी जब आए कॉलेज, नए मुर्गे जूनियर,

रात दिन लिए sessions लिए नाम पे इंट्रो के हमने,

रॉब के कुछ और महीने धीरे-धीरे लगे थे काटने ,

प्लेसमेंट लेके हुई पार्टी दारु रम की,

वैसे तो ये होती रहती मगर अलग थी बात इसकी,

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आ गया अब जाने का दिन, अलविदा ओ VAMNICOM.

जाने कब फ़िर आना होगा, अलविदा ओ VAMNICOM.
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PMC:- पिया मिलन चौराहा
FC:- Fergusson College

18 March 2009

हज़ल - तेरी उफ़, हर अदा के वो उजाले याद आते हैं

आप सभी को मेरा नमस्कार,

आज मैं जो हज़ल (हास्य ग़ज़ल) यहाँ लगा रहा हूँ, उसे आप गुरु जी और हठीला जी द्वारा आयोजित किए गए तरही मुशायेरे में पहले ही पढ़ चुके होंगे। अपने आप में अद्भुत मुशयेरा था ये, मैं भी पहली बार मसहिया ग़ज़ल लिखी है। अब आप ही बताएँगे की मैं अपनी इस कोशिश में कितना कामयाब रहा हूँ।


तुम्हारे शहर के गंदे वो नाले याद आते हैं।
उसी से भर के गुब्बारे उछाले याद आते हैं।

पकोडे मुफ्त के खाए थे जो दावत में तुम्हारी,
बड़ी दिक्कत हुई अब तक मसाले याद आते हैं।

भला मैं भूल सकता हूँ तेरे उस खँडहर घर को,
वहां की छिपकली, मकडी के जाले याद आते हैं।

बड़ी मुश्किल से पहचाना तुझे जालिम मैं भूतों में,
वो चेहरे लाल, पीले, नीले, काले याद आते हैं।

कोई भी रंग ना छोड़ा तुझे रंगा सभी से ही,
तेरी उफ़, हर अदा के वो उजाले याद आते हैं।