24 September 2012

ग़ज़ल - शहद सी बोलियाँ लब चढ़ी हैं प्रिये

आज जिस ग़ज़ल से आप का तआरुफ़ करवाने जा रहा हूँ, मुमकिन है आप उस ग़ज़ल से 'सुबीर संवाद सेवा' में आयोजित तरही मुशायरे में भी मिल चुके होंगे। 
ये भी सच है कि पहली मुलाक़ात ही दूसरी बार मिलने का सबब बनती है। 



गो मुलाकातें अपनी बढ़ी हैं प्रिये 
फिर भी कुछ आदतें अजनबी हैं प्रिये 

उजला-उजला सा है तेरा चेहरा दिखा
ख़्वाब की सब गिरह जब लगी हैं प्रिये

ज़िक्र जब भी तेरा इस ज़ुबां से लगा
शहद सी बोलियाँ लब चढ़ी हैं प्रिये

यूँ लगे जैसे तेरे तसव्वुर में भी
खुश्बुएँ मोगरे की गुँथी हैं प्रिये

दो निगाहें न उल्फ़त छिपा ये सकी
आहटें दिल तलक जा चुकी हैं प्रिये

खैरियत सुन के भी चैन पड़ता नहीं
फ़िक्र में चाहतें भी घुली हैं प्रिये

ले कई आरजू दिल की दहलीज़ पर
प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये

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गो:- यद्दपि
गिरह:- गाँठ
तसव्वुर:- ख़याल

22 August 2012

ग़ज़ल - दोस्त से बढ़ के देखिये मुझको

एक ग़ज़ल कहने की कोशिश की है, कुछ शेर बुन लिए है मगर लगता है अभी इस रदीफ़ और काफिये पर कुछ शेर और भी बुने जा सकते हैं। जब तक मैं उन आने वाले शेरों की खैर-मक़दम में लगता हूँ तब तक आप इन शेरों को पढ़िए। आप, अपनी पसंद या नापसंद से वाकिफ़ ज़रूर करवाइयेगा। अरुज़ियों से माफ़ी क्योंकि मतले में ईता का दोष बन रहा है।

दोस्त से बढ़ के देखिये मुझको
आप यूँ भी तो सोचिये मुझको

उसकी आदत ग़ज़ल के मिसरे सी
कह रहा है निभाइये मुझको

मैं उसे मिल भी जाऊं मुमकिन है
वो मुहब्बत से गर जिये मुझको

तेरी यादों में एक कोना भर
सिर्फ इतना ही चाहिए मुझको

कट गई है पतंग शोहरत की
आप भी आके लूटिये मुझको

तोहमतों और नसीहतों के साथ
कुछ दुआएं भी दीजिये मुझको

बस हटा कर मेरे तख़ल्लुस को
शेर मेरा सुनाइये मुझको

04 July 2012

ग़ज़ल - अपने वादे से मुकर के देख तू

आहिस्ता-आहिस्ता मुंबईया बारिश, शहर को अपनी उसी गिरफ्त में लेती जा रही है, जिसके लिए वो मशहूर है। यकीनन इस दफ़ा कुछ देर ज़रूर हुई मगर उम्मीद तो यही है कि बचे-खुचे वक़्त में उसकी भी कोर कसर  पूरी हो जाएगी। अगर आपके शहर में बारिश नहीं पहुंची है तो जल्दी से बुला लीजिये और अगर पहुँच चुकी है तो लुत्फ़ लीजिये।

 ('जुहू बीच' पर कुछ बेफ़िक्र लहरें )
फिलहाल तो मैं यहाँ पर आप सब के लिए अपनी एक हल्की -फुल्की ग़ज़ल छोड़े जा रहा हूँ। पढ़िए और बताइए कैसी लगी? 

अपने वादे से मुकर के देख तू
फिर गिले-शिकवे नज़र के देख तू

इक नया मानी तुझे मिल जायेगा
मेरे लफ़्ज़ों में उतर के देख तू

कोई शायद कर रहा हो इंतज़ार
फिर वहीं से तो गुज़र के देख तू

हर किनारे को डुबोना चाहती
हौसले तो इस लहर के देख तू

ज़िन्दगी ये खूबसूरत है बहुत
हो सके तो आँख भर के देख तू

ख़्वाब की बेहतर उड़ानों के लिए
नींद के कुछ पर कतर के देख तू

फूलती साँसें बदन की कह रहीं
आदमी कुछ तो ठहर के देख तू

कह रही 'ग़ालिब' की मुझ से शायरी
डूब मुझ में फिर उभर के देख तू