25 November 2008

ग़ज़ल - ये खंडहर हैं किसी की यादें.........

वो सज संवर के निकल रहे हैं।
हवा फिज़ा सब बदल रहे है।

तिरी नज़र, होठ, ज़ुल्फ़, चिलमन,
मिरी ही कोई ग़ज़ल रहे हैं।

कसम वो तुमको न सोचने की,
किए जो वादे पिघल रहे हैं।

है प्यार यारों नया ही हरदम,
कदम संभल कर फिसल रहे हैं।

ये खंडहर हैं किसी की यादें,
कभी ये जगमग महल रहे हैं।

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