22 April 2010

ग़ज़ल - मेरी साँसों में बहती है...तेरी साँसों की सरगम भी

एक ताज़ा ग़ज़ल आपके लिए पेश-ए-ख़िदमत है।

बहर :- बहरे मुतदारिक मुसमन मक्तूअ
रुक्न:- २२-२२-२२-२२

बेचैनी का ये आलम भी.
पागल तुम दीवाने हम भी.

प्यार भरे तेरे इस ख़त में
लफ्ज़ चले आये कुछ नम भी.

मेरी साँसों में बहती है
तेरी साँसों की सरगम भी.

इक संदूक मिला खुशियों का
एक पोटली में कुछ ग़म भी.

साथ चले आये बारिश के
बीती यादों के मौसम भी.

तुमने आने की जिद क्या की
वक़्त चले अब कुछ मद्धम भी.

अभी आप से विदा लेता हूँ इस वादे के साथ कि एक ताज़ा ग़ज़ल के साथ जल्द ही वापिस आऊंगा...............

30 March 2010

ग़ज़ल - गुनाहों को अपने छिपायें कहाँ तक

गुनाहों को अपने छिपायें कहाँ तक.
बहुत दूर जाके भी जायें कहाँ तक.

गलत राह पर उसका गिरना तो तय था 
भला साथ देती दुआयें कहाँ तक.

अहम् को बचाने की जद्दोज़हद में 
वो झूठी कहानी सुनायें कहाँ तक.

हमें खौफ़ गलती का बांधे हुए है 
मगर सच से नज़रे चुरायें कहाँ तक.

न मकसद कोई ज़िन्दगी का तिरे बिन 
ये साँसों से रिश्ता निभायें कहाँ तक.

मिरे मन मुसाफिर को यादों के रस्ते 
भटकने से आखिर बचायें कहाँ तक.

बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम (१२२-१२२-१२२-१२२) पर ये ग़ज़ल कही गयी है, इसके बहुत से उदाहरण आपको गौतम भैय्या (मेजर गौतम राजरिशी जी) के ब्लॉग पे मिलेंगे.

अपने विचारों से इसका स्वागत करें...............

23 March 2010

२३ मार्च, १९३१

आज से ठीक ७८ वर्ष पहले, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु ने हँसते-हँसते फांसी के फंदे को चूमा था. कभी ना मरने वाले उस जज़्बे को सलाम.


९ अप्रैल, १९२९ को केंद्रीय सभागार में फेंके गए पर्चे में लिखा था.....................
"It is easy to kill individuals but you cannot kill the ideas. Great empires crumbled while the ideas survived."
इंक़लाब जिंदाबाद