राजस्थान में एक महीने की ट्रेनिंग के बाद कुछ ही वक़्त बिताया मुंबई में और फिर आ गया उत्तर प्रदेश में, वैसे आजकल लखनऊ में डेरा जमाया हुआ है और यहीं पर बना रहेगा ९ सितम्बर तक. वीनस जी ने पूछा था की इलाहाबाद कब आना हो रहा है? वीनस जी इस बार तो मौका नहीं मिल पायेगा अगली बार पूरी कोशिश रहेगी.
हाज़िर हूँ आप सबके सामने एक छोटी बहर (बहरे मुतदारिक मुसमन मक्तूअ २२-२२-२२-२२) की ग़ज़ल के साथ, जो गुरु जी का आर्शीवाद पाकर, आपका प्यार लेने के लिए आ गई है.
जब ख़ुद से मिलता हूँ अक्सर
सोच हजारों लेंती टक्कर
जंग छिडी लगती दोनों में
बारिश की बूंदे औ' छप्पर
खेल गली के भूल गए सब
जब से घर आया कंप्यूटर
नफरत, आदम साथी लगते
याद किसे अब ढाई आखर
कद ऊँचा है जिन लोगों का
आंसू अन्दर, हंसते बाहर
ज़ख्म कहाँ भर पाए गहरे
आँखों में सिमटे हैं मंज़र
हर अच्छा है तब तक अच्छा
जब तक मिल पाए ना बेहतर
पिछली बार नीरज जी ने कहा था की जयपुर की कोई फोटो नहीं लगाई, वैसे लगाई तो थी मगर लीजिये एक और सही. ये अलबर्ट म्यूज़ियम के बाहर का नज़ारा है. अभी तक के लिए इतना ही, जल्द ही हाज़िर होता हूँ।




